तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को 1989 में अगर कांग्रेस के ही कुछ नेताओं ने मुसलमानों के वोट खिसक जाने का काल्पनिक खतरा दिखाकर भ्रमित न किया होता तो अयोध्या विवाद का निपटारा तभी हो जाता।
बकौल रिजवी, हम लोगों का मानना था कि मंदिर निर्माण का काम शुरू होने से हिंदू संगठनों की तरफ से राम मंदिर के सहारे हिंदुत्व के एजेंडे को धार देने की रणनीति को समर्थन नहीं मिलेगा। साथ ही कांग्रेस भी हिंदुओं की नजर में खलनायक नहीं बनेगी और उसे मंदिर निर्माण में अड़ंगेबाजी के आरोपों से हो रहे नुकसान से बचाया जा सकेगा।
रही बात मुस्लिमों की नाराजगी की तो ताला खुलने के बाद जितना नुकसान होना था, वह हो चुका था। कारण, ताला भले ही न्यायालय के आदेश से खुला था लेकिन मुसलमानों को अपने पाले में करने के लिए कुछ लोग इसके पीछे कांग्रेस का हाथ होने की अफवाह फैला रहे थे। डॉ. रिजवी बताते हैं, हम लोगों ने इस बारे में कई मुस्लिम नेताओं और धर्मगुरुओं से भी बातचीत की थी।
वे भी सहमत थे कि अविवादित स्थल पर मंदिर निर्माण पर उन्हें एतराज नहीं है। शुरुआत में राजीव गांधी सहमत थे। पर, निर्माण शुरू होने के बाद कांग्रेस के कुछ नेताओं ने कागजी संगठनों के जरिये ऐसा भ्रम फैलवाया कि राजीव गांधी की भी हिम्मत जवाब दे गई। शिलान्यास और निर्माण शुरू होने के बाद उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी से काम रुकवाने को कहा।
बकौल रिजवी, योजना यह थी कि जब तक अविवादित स्थल पर निर्माण चलेगा, उसी दौरान सरकार प्रयास करके मुस्लिम पक्षकारों को इस स्थल को हिंदुओं को सौंपने के लिए राजी करने की कोशिश करेगी। किसी कारण ऐसा न भी हो पाया तो भी अविवादित स्थल पर मंदिर बनना शुरू होने से हिंदुओं की नाराजगी कम होगी। साथ ही विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने में मदद मिलेगी। इसीलिए जब राजीव गांधी ने शिलान्यास के बाद काम रुकवाने को कहा तो तिवारीजी ने उन्हें समझाने की कोशिश की, ‘इससे कांग्रेस कहीं की न रहेगी। न हिंदुओं की सहानुभूति कांग्रेस के पक्ष में रहेगी और न मुसलमानों की। पर, राजीव गांधी के लगातार अड़े रहने के कारण काम रुकवाना पड़ा।’