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राजीव गांधी को भ्रमित न करते तो 89 में सुलझ जाता अयोध्या विवाद

Thu, 14 Nov 2019 04:04 AM IST
दुष्यंत शर्मा अखिलेश वाजपेयी, लखनऊ
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राजीव गांधी (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
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तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को 1989 में अगर कांग्रेस के ही कुछ नेताओं ने मुसलमानों के वोट खिसक जाने का काल्पनिक खतरा दिखाकर भ्रमित न किया होता तो अयोध्या विवाद का निपटारा तभी हो जाता। 

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राजीव गांधी और प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी अयोध्या में अविवादित भूमि पर मंदिर निर्माण शुरू कराकर प्रदेश में फैल रहे सांप्रदायिक तनाव को खत्म करने के पक्ष में थे। इसी आधार पर राजीव गांधी ने तिवारी को शिलान्यास करा देने के लिए सहमति दी थी। 

पर, कांग्रेस के कुछ नेताओं को इससे अपनी सियासत की दुकान बंद होती दिखी तो उन्होंने राजीव गांधी को वोटों के नुकसान का कथित भय दिखाकर भ्रमित कर दिया। तब राजीव ने काम रुकवाने को कहा।
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यह रहस्योद्घाटन एनडी तिवारी के मंत्रिमंडल में शामिल तत्कालीन वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री डॉ. अम्मार रिजवी ने बुधवार को यहां ‘अमर उजाला’ से बातचीत में किया। उन्होंने स्वीकार किया कि अयोध्या आंदोलन शुरू होने के बाद कांग्रेस के ज्यादातर नेताओं की राय मंदिर निर्माण के पक्ष में थी। 

सभी का कहना था कि जब न्यायालय ने हिंदुओं की पूजा-अर्चना के लिए संबंधित स्थल का ताला खोल दिया है तो परिसर के आसपास अविवादित भूमि पर संतों को मंदिर निर्माण की इजाजत दे देनी चाहिए क्योंकि व्यावहारिक रूप से इस स्थान पर अब मस्जिद का निर्माण संभव नहीं है। 

इस बारे में भाजपा और हिंदू संगठनों के तत्कालीन शीर्ष नेतृत्व के साथ मुस्लिम पक्ष के भी प्रमुख लोगों से बातचीत हुई थी। हिंदू संगठन तैयार थे कि शिलान्यास कराकर अविवादित स्थल पर निर्माण की अनुमति दे दी जाए तो वे आंदोलन को फिलहाल स्थगित कर देंगे। वहीं, मुस्लिमों को भी विवादित स्थल के अलावा किसी स्थान पर एतराज नहीं था।

...तब राजीव ने काम रुकवाने को कहा

बकौल रिजवी, हम लोगों का मानना था कि मंदिर निर्माण का काम शुरू होने से हिंदू संगठनों की तरफ से राम मंदिर के सहारे हिंदुत्व के एजेंडे को धार देने की रणनीति को समर्थन नहीं मिलेगा। साथ ही कांग्रेस भी हिंदुओं की नजर में खलनायक नहीं बनेगी और उसे मंदिर निर्माण में अड़ंगेबाजी के आरोपों से हो रहे नुकसान से बचाया जा सकेगा। 

रही बात मुस्लिमों की नाराजगी की तो ताला खुलने के बाद जितना नुकसान होना था, वह हो चुका था। कारण, ताला भले ही न्यायालय के आदेश से खुला था लेकिन मुसलमानों को अपने पाले में करने के लिए कुछ लोग इसके पीछे कांग्रेस का हाथ होने की अफवाह फैला रहे थे। डॉ. रिजवी बताते हैं, हम लोगों ने इस बारे में कई मुस्लिम नेताओं और धर्मगुरुओं से भी बातचीत की थी। 

वे भी सहमत थे कि अविवादित स्थल पर मंदिर निर्माण पर उन्हें एतराज नहीं है। शुरुआत में राजीव गांधी सहमत थे। पर, निर्माण शुरू होने के बाद कांग्रेस के कुछ नेताओं ने कागजी संगठनों के जरिये ऐसा भ्रम फैलवाया कि राजीव गांधी की भी हिम्मत जवाब दे गई। शिलान्यास और निर्माण शुरू होने के बाद उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी से काम रुकवाने को कहा।

तिवारी ने कहा था, ‘तो कांग्रेस कहीं की न रहेगी’

बकौल रिजवी, योजना यह थी कि जब तक अविवादित स्थल पर निर्माण चलेगा, उसी दौरान सरकार प्रयास करके मुस्लिम पक्षकारों को इस स्थल को हिंदुओं को सौंपने के लिए राजी करने की कोशिश करेगी। किसी कारण ऐसा न भी हो पाया तो भी अविवादित स्थल पर मंदिर बनना शुरू होने से हिंदुओं की नाराजगी कम होगी। साथ ही विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने में मदद मिलेगी। इसीलिए जब राजीव गांधी ने शिलान्यास के बाद काम रुकवाने को कहा तो तिवारीजी ने उन्हें समझाने की कोशिश की, ‘इससे कांग्रेस कहीं की न रहेगी। न हिंदुओं की सहानुभूति कांग्रेस के पक्ष में रहेगी और न मुसलमानों की। पर, राजीव गांधी के लगातार अड़े रहने के कारण काम रुकवाना पड़ा।’

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