लखनऊ। सड़क हादसों के बाद की कार्रवाई पर पुलिस और प्रशासन को आईना दिखाते हुए सड़क सुरक्षा विशेषज्ञ डॉ. रोहित बलूजा का कहना है कि जांच की मौजूदा प्रणाली में सच्चाई से ज्यादा सुविधा देखी जाती है। खराब मौसम, धुंध, तेज गति और चालक की लापरवाही जैसे रटे-रटाए कारण लिखकर सिस्टम अपनी जिम्मेदारी से बच निकलता है, जबकि असली वजहें अक्सर सड़क और प्रशासनिक खामियों से जुड़ी होती हैं।
परिवहन, यातायात, लोक निर्माण विभाग और पुलिस अधिकारियों के दो दिवसीय प्रशिक्षण के दौरान डॉ. बलूजा ने उत्तराखंड के एक बस हादसे का उदाहरण देते हुए बताया कि बस के गहरी खाई में गिरने से कई लोगों की मौत हो गई थी। जब उनकी टीम जांच के लिए मौके पर पहुंची, तब तक टायरों के निशान समेत कई अहम सबूत हट चुके थे। थाने में दर्ज एफआईआर में सिर्फ यह लिखा गया कि धुंध के कारण चालक को रास्ता नहीं दिखा और हादसा हो गया। जब उनकी टीम ने वहां सभी पहलुओं पर जांच की तो असल वजह सड़क की बनावट, संकेतकों और सुरक्षा इंतजामों की कमी निकली।
उन्होंने कहा कि एक अन्य दुर्घटना में हादसे की वजह तेज गति में वाहन चलाना दिखाया गया था, जबकि हादसे में बची एक युवती से जब उनकी टीम ने बात की तो उसने इससे इन्कार किया। युवती ने बताया कि चालक धीमी गति से वाहन चला रहा था। पड़ताल में वहां सड़क पर मार्किंग, शेफ्टी गार्ड लगा नहीं पाया गया। अगर ये होते तो हादसा बच सकता था।
उन्होंने कहा कि यूपी सहित अधिकांश राज्यों में दुर्घटना के बाद विवेचना का दायरा बेहद सीमित कर दिया जाता है और पूरा बोझ चालक पर डाल दिया जाता है। सड़क की डिजाइन, रखरखाव, रोड मार्किंग, सेफ्टी बैरियर और प्रकाश व्यवस्था जैसे अहम पहलू फाइलों से बाहर ही रह जाते हैं। इससे न तो सिस्टम की जवाबदेही तय होती है और न ही भविष्य में हादसों को रोकने के लिए ठोस सुधार हो पाता है। उन्होंने सभी से वैज्ञानिक, निष्पक्ष और बहुआयामी जांच प्रणाली अपनाने का आह्वान किया, ताकि हादसों के असली कारण सामने आ सकें और सड़क सुरक्षा को लेकर ठोस कदम उठाए जा सकें।