लोहिया संस्थान में डॉक्टरों ने जीभ के कैंसर से पीड़ित मरीज को नई जिंदगी दी है। छह घंटे तक चली जटिल सर्जरी के बाद कैंसर ग्रस्त हिस्से को निकाला गया। इसके बाद हाथ के मांस से नई जीभ बनाकर उसे शेष बचे हिस्से के साथ प्रत्यारोपित किया गया।
यह सब फ्री फ्लैप सर्जरी टेक्नीक की मदद से संभव हो सका। मरीज अब पूरी तरह ठीक है। डॉक्टरों का मानना है कि तीन महीने में मरीज सामान्य तरीके से बात कर सकेगा और किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होगी।
लोहिया संस्थान में पहली बार फ्री फ्लैप सर्जरी की गई।ऑन्को सर्जरी विभाग के हेड डॉ. आशीष सिंघल ने बताया कि बलरामपुर जिले के मगईपुर गांव से आए अली हसन (63) जब लोहिया संस्थान पहुंचे तो उनके जीभ के भीतरी हिस्से तक कैंसर फैल चुका था।
मरीज को नई जिंदगी देने के लिए 10 जनवरी को सर्जरी की गई। उन्होंने बताया कि सबसे पहले जीभ के बायीं तरफ वाले कैंसरग्रस्त हिस्से को काटकर निकाला गया। इसे मेडिकल की भाषा में ग्लोसेक्टॉमी कहते हैं।
गले की नसों को भी कैंसर कोशिकाओं ने घेर लिया था, उन्हें भी निकाल दिया गया। इसके बाद बाएं हाथ से 15गुणा 7 सेमी मांस निकाला गया और उससे जीभ का एक हिस्सा तैयार किया गया।
नई जीभ बनाने के बाद उसे फिक्स किया गया। मरीज की सर्जरी में करीब 50 हजार रुपये का खर्च आया। निजी सेंटर पर इस सर्जरी पर करीब पांच लाख रुपये खर्च होते।
तीन महीने तक चलेगी ट्रेनिंग
डॉ. आशीष और डॉ. अखलाक
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डॉ. आशीष बताते हैं कि जीभ की बारीक कोशिकाओं से हाथ के मांस से बनी जीभ को जोड़ना चुनौतीपूर्ण था। एक कोशिका से भी रक्त के प्रवाह में किसी तरह का अवरोध होता तो ऑपरेशन फेल हो जाता और मरीज के नए हिस्से की जीभ में सड़न के साथ संक्रमण बढ़ जाता।
इसे देखते हुए बारीकी के साथ ऑपरेटिंग माइक्रोस्कोप से कोशिकाओं को देखा गया और उसे जोड़ा गया। डॉ. आशीष बताते हैं कि मरीज के जीभ में कैंसर के साथ गले में गिल्टियां भी थीं, जिन्हें 20*10 सेमी का चीरा लगाकर निकाला गया।
वो बताते हैं कि गिल्टियों को निकालने के लिए जो चीरा गले में लगाया गया था उसकी मदद से जीभ की प्रमुख रक्तवाहिका जो हाथ से ली गई थी, उसे आसानी से जोड़ा जा सका।
डॉ. अखलाक हुसैन ने बताया कि फ्री फ्लैप सर्जरी के बाद मरीज के जीवन को सामान्य बनाने के लिए अगले तीन महीने तक रिहैब्लिटेशन कोर्स कराया जाएगा।
इसमें मरीज के पुनर्वास और बेहतर तरीके से बोलने के साथ सामान्य जिंदगी जीने की ट्रेनिंग दी जाएगी। मरीज नए अंग के साथ खुद को एडस्ट कर सके इसके लिए उसे मानसिक रूप से मजबूत भी बनाया जाएगा।
डॉ. अखलाक ने बताया कि जीभ के कैंसर के मामले में जीभ को निकाला जाता है तो टेस्ट बड्स खराब हो जाते हैं और खाने का स्वाद नहीं मिलता है। हालांकि अली हसन की आधी जीभ बची है, जिससे वह स्वाद ले सकता है।
डाॅक्टर आशीष सिंघल के साथ डॉ. अखलाक हुसैन, डॉ. विवेक, डॉ. अंकुर वर्मा, डॉ. नवनीत त्रिपाठी समेत एनेस्थेसिया टीम में निदेशक डॉ. दीपक मालवीय और डॉ. पीके दास सर्जरी टीम में शामिल रहे।