कांग्रेस पार्टी को इन दिनों बड़ी रैलियों के बजाय छोटे प्रदर्शन ज्यादा भा रहे हैं।
राजधानी लखनऊ व वाराणसी में हुए प्रदर्शन की सफलता ने प्रदेश के कांग्रेसी नेताओं को और भी उत्साहित कर दिया है।
इसलिए पार्टी अब बड़ी रैलियों का रिस्क उठाने के बजाय मंडल स्तरीय प्रदर्शन पर ज्यादा ध्यान दे रही है। लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी ज्यादातर बड़ी राजनैतिक पार्टियोंका पूरा जोर इन दिनों रैलियों पर है।
भाजपा हो या सपा दोनों ही दल प्रदेश में जगह-जगह रैलियां कर रहे हैं। बसपा भी लखनऊ में बड़ी रैली करने जा रही है।
जबकि कांग्रेस इन सबसे इतर अपनी अलग रणनीति बना रही है। दरअसल, नरेंद्र मोदी की यूपी की रैलियों को देख कांग्रेस ने भी अपने स्टार प्रचारक राहुल गांधी की प्रदेश में दो रैलियां करवाईं।
भीड़ के लिहाज से रामपुर व अलीगढ़ की रैली फ्लॉप साबित हुई। इसको लेकर उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के नेताओं की दिल्ली में फटकार भी लगी।
इस कारण हमीरपुर व देवरिया की रैली की तारीख भी कांग्रेस को बदलनी पड़ी थी। बाद में जब रैली हुई तो भी वह भाजपा की रैलियों के मुकाबले टिक नहीं पाई।
बगैर संगठन के पूरी तरह खड़े हुए कैसे जुटे भीड़ प्रदेश कांग्रेस के नेता बड़ी रैलियों के बजाय मंडल स्तरीय प्रदर्शन पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।
इन प्रदर्शनों में आस-पास के आठ से 10 जिलों के कार्यकर्ताओं को बुलाया जाता है। इसकी एक प्रमुख वजह यह भी है कि अभी कांग्रेस पार्टी का प्रदेश में संगठन पूरी तरह खड़ा नहीं हो सका है।
ब्लॉक व वार्ड स्तर के साथ ही बूथ स्तर की कमेटियां अभी गठित नहीं हुई हैं। बगैर संगठन के रैलियों में भीड़ जुटाना आसान नहीं है।
इसलिए भी प्रदर्शन को तरजीह
कांग्रेस यह भी चाहती है कि वह छिटपुट गतिविधियां कर सुर्खियों में भी बनी रहे। इसलिए जनहित के मुद्दों को उठाकर महीने में किसी एक जिले में इस तरह का मंडल स्तरीय प्रदर्शन कर रही है।
इसी रणनीति के तहत 21 जनवरी को मेरठ व 30 जनवरी को लखनऊ में प्रदर्शन होने जा रहा है।