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...तो यूपी में भी सस्ती हो सकती है बिजली!

Sat, 04 Jan 2014 08:21 AM IST
अनिल श्रीवास्तव/अमर उजाला ब्यूरो
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प्रदेश में घरेलू बिजली दरों में कमी करने के लिए मेरिट ऑर्डर डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम भी कारगर हो सकता है। बिजली विशेषज्ञों का मानना है कि इस सिस्टम का प्रावधान विद्युत अधिनियम में भी है लेकिन इस पर अमल नहीं हो रहा है।
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विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अगर सरकार वास्तव में दरें कम करके लोगों को राहत देना चाहती है तो बिजली के लिए निजी क्षेत्र पर निर्भरता कम करनी होगी।

सार्वजनिक क्षेत्र से ज्यादा से ज्यादा बिजली खरीदने के साथ ही ऐसे विकल्प तलाशने होंगे जहां से सस्ती बिजली मिल सके। महंगी बिजली खरीदकर सस्ते में देना संभव नहीं है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, मध्यम वर्ग के लोगों को सस्ती बिजली उपलब्ध कराना कोई बड़ी बात नहीं है। बिजली चोरी पर अंकुश, लाइन हानियां कम करना, शत प्रतिशत मीनीटरिंग, राजस्व वसूली बढ़ाने जैसे विकल्प तो हैं।
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लेकिन विद्युत अधिनियम में भी मेरिट ऑर्डर डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम जैसा प्रावधान है जिसे अपनाकर उन श्रेणियों को राहत जरूर दी जा सकती है जो महंगी बिजली का बोझ नहीं उठा सकते हैं।

मेरिट ऑर्डर डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम में यह व्यवस्था है कि जिस श्रेणी की जितनी क्षमता हो, उसे उतनी कीमत की बिजली उपलब्ध कराई जाए।

इस सिस्टम के तहत राज्य और केंद्रीय सेक्टर के बिजलीघरों से 1.70 रुपये से 3.50 रुपये प्रति यूनिट की दर से मिलने वाली बिजली ग्रामीण, कृषि व घरेलू उपभोक्ताओं को दी जानी चाहिए।

इसके बाद सार्वजनिक क्षेत्र के बिजलीघरों से अगर महंगी बिजली मिलती है तो वह कॉमर्शियल व औद्योगिक श्रेणी के उपभोक्ताओं को दी जानी चाहिए।

निजी क्षेत्र से खरीदी जाने वाली महंगी बिजली का बोझ तो आम उपभोक्ताओं पर पड़ना ही नहीं चाहिए। यह उन लोगों को दी जानी चाहिए जो बिजली का इस्तेमाल व्यावसायिक गतिविधियों या विलासिता के लिए करते हैं।

विशेषज्ञों का सुझाव है कि बड़े-बड़े बंगलों में रहने वालों, जिनकी खपत आम उपभोक्ताओं के मुकाबले तीन-चार गुना ज्यादा है, की भुगतान क्षमता को देखते हुए उनके लिए अलग स्लैब बनाकर ज्यादा दर तय की जानी चाहिए।

इससे हर माह 100 से लेकर 500 यूनिट तक बिजली का इस्तेमाल करने वालों पर बोझ कम किया जा सकता है। रेलवे समेत तमाम सेवाओं, यहां तक कि भूमि अधिग्रहण में ‘लग्जरी एलीमेंट’ की अलग व्यवस्था है तो बिजली में क्यों नहीं हो सकती।

विशेषज्ञों का कहना है कि वितरण की तरह बिजली खरीदने की प्रक्रिया में भी सुधार की जरूरत है। मांग कम होने पर गैस आधारित परियोजनाओं, निजी उत्पादकों, ट्रेडिंग कंपनियों या द्विपक्षीय समझौते के तहत खरीदी जाने वाली महंगी बिजली को सरेंडर न करके राज्य या केंद्रीय बिजलीघरों में थर्मल बैंकिंग (उत्पादन क्षमता कम कराना) कराई जाती है जिसकी बिजली काफी सस्ती होती है।

होना यह चाहिए कि जब भी बिजली सरेंडर करने की नौबत आए तो सबसे पहले यह देखा जाना चाहिए जिन स्रोतों से बिजली ली जा रही है, उनमें से सबसे महंगी किसकी है।

वहीं से सरेंडर की शुरुआत होनी चाहिए। इससे बिजली कंपनियों पर आर्थिक बोझ कम होगा और निश्चित तौर पर इसका फायदा उन उपभोक्ताओं को हो सकता है जो महंगी बिजली का बोझ नहीं उठा सकते।

इसी तरह बिजली खरीदते समय भी नीचे से ऊपर की तरफ बढ़ना चाहिए, जबकि हो उल्टा रहा है। जिसकी बिजली महंगी है, पहले उसे खरीदने को प्राथमिकता दी जाती है।

बिजली विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि प्रदेश में बिजली दरें बढ़ने की एक बड़ी वजह वर्ष 2000 में ऊर्जा सुधार कार्यक्रम लागू होने के बाद निजी क्षेत्र पर निर्भरता का बढ़ना भी है।

निजी क्षेत्र हावी होता जा रहा है और नतीजतन प्रदेश को अनाप-शनाप दरों पर बिजली खरीदने को मजबूर होना पड़ रहा है।

तीन साल पहले जिन परियोजनाओं के लिए एमओयू हुए थे, उनमें से इक्का-दुक्का को छोड़कर किसी पर काम शुरू नहीं हुआ। एमओयू की अवधि दो बार 18-18 महीने बढ़ाई गई है।

एमओयू आधारित परियोजनाओं के बारे में फैसला लेते समय सरकार को यह भी ध्यान में चाहिए इन सभी परियोजनाओं की बिजली दर इन पर आने वाली लागत के आधार पर तय होगी।

जितनी देर से परियोजना लगेगी, उतना ही ज्यादा पैसा लगेगा और प्रदेश को ज्यादा दर पर बिजली खरीदनी पड़ेगी। ऐसे में निजी क्षेत्र पर निर्भरता में कमी लाकर भी उपभोक्ताओं को राहत दी जा सकती है।
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निजी क्षेत्र बिना प्रॉफिट के तो बिजली देने से रहा, इसलिए उन स्रोतों पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए जहां से सस्ती बिजली उपलब्ध हो सकती है।
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