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गठबंधन के लिए बेहद कड़ी चुनौती हैं यूपी की ये 42 सीटें, आसान नहीं तालमेल बैठाना

Sun, 13 Jan 2019 12:35 PM IST
अभिषेक त्यागी राजेंद्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
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मायावती व अखिलेश यादव - फोटो : amar ujala
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करीब 25 साल बाद फिर साथ आए सपा-बसपा के सामने चुनौतियां भी कम नहीं है। अन्य पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जाति के वोटों के लिए जहां गठबंधन और भाजपा आमने-सामने होंगे, वहीं मुस्लिम वोटों को लेकर उसे कांग्रेस से पार पाना होगा। हालांकि दोनों दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन 42 जिलों के दावेदारों को संभालना होगा जो गठबंधन में दूसरे के हिस्से में चली गई हैं।

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प्रदेश के दोनों बड़े दल सपा-बसपा 38-38 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। यानी 42 सीटों पर उनके उम्मीदवार नहीं होंगे। इन सीटों पर टिकट के दावेदारों को संभालना और संतुष्ट करना आसान नहीं होने वाला है।

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उनके बागी होने की आशंका से जूझना होगा। ऐसी सीटों पर दोनों दलों के कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल बैठाना बड़ी चुनौती है क्योंकि सपा-बसपा लंबे समय से एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं।

दलितों, पिछड़ों, मुस्लिमों के वोटों के लिए करनी होगी मशक्कत

सपा-बसपा गठबंधन का मुख्य फोकस अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़े, अल्पसंख्यक, महिलाओं और युवाओं पर है। भाजपा ने भी इन्हें जोड़ने के लिए काफी काम किया है।

भाजपा ने जातिवार 23 सामाजिक सम्मेलन किए हैं। अनुसूचित जाति के सम्मेलन भी हुए हैं। भाजपा ने पिछड़ों व दलितों में अच्छी घुसपैठ की है। उसकी कोशिश होगी कि वह गठबंधन के प्रभाव को सीमित रखे।

सपा व बसपा का संगठनात्मक ढांचा मजबूत है, लेकिन भाजपा ने इस पर बहुत कसरत की है। 25 साल पहले की तुलना में आज की भाजपा में बड़ा बदलाव है। भाजपा ने सोशल इंजीनियरिंग व बूथ मैनेजमेंट पर काफी काम किया है।
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मुस्लिम वोटों के लिए भी जूझना होगा

मुस्लिम मतों के लिए इस बार सपा-बसपा गठबंधन और कांग्रेस में मारामारी रहने की संभावना है। तीन राज्यों में चुनाव जीतने के बाद मुस्लिमों का रुझान कांग्रेस की तरफ हुआ है। ऐसी स्थिति में मुस्लिम मतों का रुझान काफी हद तक गठबंधन को प्रभावित करेंगे।
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