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मायावती नहीं भूलीं गेस्ट हाउस कांड, साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में आया जिक्र

Sun, 13 Jan 2019 12:41 AM IST
MANISH sachan न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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बसपा सुप्रीमो मायावती - फोटो : amar ujala
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इस साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती ने सपा से हाथ तो मिला लिया, लेकिन वह दो जून 1995 के गेस्ट हाउस कांड को भूली नहीं हैं। अखिलेश के साथ साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में मायावती ने गेस्ट हाउस कांड को याद करते हुए कहा कि हमने इस घटना से ऊपर उठकर देशहित में गठबंधन का फैसला किया है। 

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दिलचस्प बात यह रही कि मायावती ने तो 1993 के गठबंधन का उल्लेख करते हुए कांशीराम के साथ दो बार मुलायम सिंह यादव का नाम लिया, लेकिन अखिलेश ने एक बार भी पूरे कॉन्फ्रेंस के दौरान अपने पिता का नाम नहीं लिया। 

शायद यही वजह थी कि दोनों ही पार्टियों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए बनाए गए मंच के बैकड्रॉप पर कांशीराम व मुलायम सिंह यादव की तस्वीरें लगाने के बजाय डॉ. भीमराव आंबेडकर व डॉ. राम मनोहर लोहिया जैसे नए प्रतीकों का सहारा लिया।
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कॉन्फ्रेंस में यह संदेश देने की कोशिश की गई कि भले ही तब डॉ. आंबेडकर व डॉ. लोहिया की तरफ से पहल के बाद भी दोनों की एक साथ काम करने की इच्छा पूरी न हो पाई हो, लेकिन अब सपा-बसपा दोनों महापुरुषों के सपने को पूरा करने के लिए साथ आए हैं। 

हालांकि यह बात दीगर है कि न तो बसपा डॉ. आंबेडकर के नक्शेकदम पर चल रही है और न ही सपा डॉ. लोहिया के समाजवाद पर।

मायावती और अखिलेश यादव के पहली बार एक साथ मंच पर आने की वजह दोनों की सियासी मजबूरियां भी हैं। भाजपा का विजय रथ रोकने के लिए हाथ मिलाना दोनों की मजबूरी बन गया था। कॉन्फ्रेंस में माया व अखिलेश की नपी-तुली बातों में इसका संदेश साफ नजर आया।

मायावती ने अखिलेश के बगल बैठकर गेस्ट हाउस कांड का र्कई बार जिक्र किया और दो बातें बड़ी स्पष्टता से कही। पहली, वह दो जून 1995 के गेस्ट हाउस कांड के ऊपर देशहित व जनहित को रखकर सपा से गठबंधन कर रही हैं। दूसरी, 1993 के सपा-बसपा गठबंधन के लिए सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव और बसपा संस्थापक कांशीराम का उल्लेख करते हुए यह भी याद दिलाया कि वह गठबंधन कुछ गंभीर कारणों से चल नहीं सका था।

गठबंधन के पीछे सियासी मजबूरियां भी

उल्लेखनीय है कि गेस्ट हाउस कांड के लिए मायावती तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को हमेशा जिम्मेदार ठहराती रही हैं। इससे साफ है कि मायावती ने पिछले लोकसभा चुनाव में एक भी सीट न मिलने से खड़ी गंभीर चुनौती से पार पाने की सियासी मजबूरियों के लिए सपा से हाथ जरूर मिलाया, लेकिन अपने साथ हुए हादसे को वह अभी भी मन से पूरी तरह निकाल नहीं पाई हैं।
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पांच दशक पहले लोहिया-आंबेडकर के बीच हुआ था पत्राचार

डॉ. आंबेडकर व डॉ. लोहिया ने 1956 में एक दूसरे को पत्र लिखकर तय किया था कि वह सामाजिक न्याय की लड़ाई मिलकर लड़ेंगे। पर दिसंबर 1956 में बाबा साहब का देहांत हो जाने की वजह से ऐसा नहीं हो सका। डॉ. आंबेडकर का कहना था कि अगर समाजवादी, समाजवाद के स्वप्न को साकार करना चाहते हैं तो उन्हें स्वीकार करना होगा कि जाति का प्रश्न एक मूलभूत प्रश्न है। जब तक जाति रूपी राक्षस को मारा नहीं जाएगा तब तक न तो राजनीतिक सुधार हो सकता है और ना ही आर्थिक सुधार। दूसरी तरफ डॉ. लोहिया ने आंबेडकर के तर्क  को और आगे ले जाते हुए समाजवादियों की भ्रांतियों और उनके तर्क  में दोषों की पहचान की। डॉ. लोहिया के अनुसार जो लोग केवल राजनीतिक और आर्थिक सुधारों की बात करते हैं और सामाजिक सुधारों के महत्व को नजरंदाज करते हैं, वे निहित स्वार्थों से प्रेरित हैं क्योंकि राजनीतिक और आर्थिक क्रांति के बाद भी सामाजिक रूप से दबे, कुचले और पिछड़े लोगों के जीवन मे कोई अंतर नही आएगा।
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