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ब्रेन स्ट्रोक के मरीज को चार अस्पतालों के लगवाए चक्कर, नहीं मिला इलाज, मौत

Mon, 22 Oct 2018 12:25 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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- फोटो : अमर उजाला
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ब्रेन स्ट्रोक के बाद परिवार ने जब मरीज की जिंदगी बचाने के लिए लखनऊ की तरफ रुख किया तो उसे इस बात का अंदाजा नहीं था कि इलाज के लिए आठ घंटे तक चार अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़ेंगे। उन्हें इस बात का भी अहसास नहीं था कि राजधानी के सरकारी चिकित्सा संस्थान और अस्पताल मरीज को बगैर इलाज लौटा देंगे और इलाज न मिलने से जान चली जाएगी। लेकिन हरदोई, हरपालपुर के परिवार के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। 
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घटना शनिवार रात की है। हरदोई हरपालपुर के रहने वाले खुशीराम (45) को रात करीब आठ बजे ब्रेन स्ट्रोक पड़ा। तीमारदार उन्हें लेकर जिला अस्पताल पहुंचे तो डॉक्टरों ने हालत गंभीर बताकर केजीएमयू रेफर कर दिया। करीब 11.30 बजे परिवार मरीज को लेकर केजीएमयू, ट्रॉमा सेंटर पहुंचा। यहां जांच में ही डेढ़ घंटा बीत गया।

जांच रिपोर्ट देखने बाद बेड न खाली होने का हवाला देकर डॉक्टरों ने लोहिया अस्पताल भेजा। जब परिवार लोहिया अस्पताल की इमरजेंसी पहुंचा तो डॉक्टरों ने विशेषज्ञ न होने की बात कहकर लोहिया संस्थान भेज दिया। लोहिया संस्थान की इमरजेंसी में मरीज को भर्ती नहीं लिया गया।
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घरवालों ने सुबह करीब आठ बजे बलरामपुर अस्पताल की इमरजेंसी में मरीज को भर्ती कराया। ईएमओ ने मरीज की हालत देख उसे वेंटिलेटर की जरूरत बताई मगर तीमारदार उसे दोबारा केजीएमयू ले जाने को राजी नहीं हुए.
 
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ब्रेन स्ट्रोक के बाद छह घंटे अहम

- फोटो : डेमो
इलाज दौरान ही दोपहर करीब 12 बजे मरीज की मौत हो गई। तीमारदार राम विलास ने बताया कि समय रहते ही उपचार मिलता तो शायद जान बच सकती थी। उनका कहना है कि वह मामले की शिकायत स्वास्थ्य मंत्री से करेंगे।

बलरामपुर अस्पताल के ईएमओ डॉ  विष्णु देव का कहना है कि महीज की हालत अति गंभीर थी। उसे सांस लेने में भी तकलीफ थी। मरीज को वेंटिलेटर स्पोर्ट की जरूरत थी। ऐसे में मरीज सरकारी अस्पताल की बजाय उसे केजीएमयू में भर्ती लिया जाना था। जहां डॉक्टरों ने बेड खाली न होने की बात कहकर वापस कर दिया। आठ घंटे तक भटकने से मरीज की हालत और भी बिगड़ गई, जिससे उसकी मौत हो गई।

डॉक्टरों का कहना है ब्रेन स्ट्रोक पड़ने पर शुरुआती छह घंटे अहम होते हैं। इसमें अस्पताल पहुंचने पर उपचार शुरू हो जाए तो काफी हद तक मरीज को कवर किया जा सकता है। ब्रेन स्ट्रोक का अटैक पड़ने पर दिमाग की कोशिकाएं मरने लगती हैैं। इसमें मरीज को विकलांगता या मौत दोनों हो सकती है।

बेड खाली नहीं होने पर दूसरे संस्थान भेजते हैं
 बेड खाली नहीं होने पर मरीजों को दूसरे बडे चिकित्सकीय संस्थानों में उपचार के लिए भेजा जाता है। ट्रॉमा सेंटर में मरीजों का बहुत लोड है। यहां हर रोज करीब 300 से अधिक मरीज उपचार के  लिए आते हैं । - डॉ संतोष कुमार, प्रवक्ता, केजीएमयू
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