विधानसभा चुनाव में भाजपा ने भले ही दुबारा सत्ता में वापसी करके जहां नया इतिहास कायम किया है, वहीं चुनाव का परिणाम प्रदेश संगठन को सवालों के घेरे में भी खड़ा कर रहा है। चुनाव परिणाम के आधार पर अब यह माना जा रहा है कि अगर संगठन ने सक्रियता से जमीन पर काम किया होता तो भाजपा 2017 के परिणाम को भी दोहरा सकती थी। ऐसे में संगठन के कुछ नेताओं की सक्रियता पर सवाल उठना लाजिमी है। वहीं इस चुनाव से यह भी साबित हुआ है कि लोक कल्याण और विकास के क्षेत्र में जमीन पर बेहतर काम करके भी सरकार बनाई जा सकती है।
दरअसल संगठन की सक्रियता व भूमिका पर अनायास सवाल नहीं उठ रहे हैं। अगर चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने से लेकर खत्म होने तक की संगठन की गतिविधियों पर गौर करें तो साफ है कि जो संगठन लाखों की संख्या में पन्ना प्रमुख बनाने, प्रभावी व मजबूत बूथ प्रबंधन के जो दावे कर रहा था, वह कहीं जमीन पर नहीं दिखा। यह भी कहा जा रहा है कि अगर भाजपा का प्रदेश संगठन 2014 व 2017 के विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव की रणनीति के अनुसार काम किया होता तो मतदान प्रतिशत बढ़ता तथा नतीजे और बेहतर आ आ सकते थे।
2022 का मतदान प्रतिशत भी संगठन की कमजोरी को प्रमाणित करता दिख रहा है। 2017 के मुकाबले इस चुनाव में 75 में से 46 जिलों में मतदान प्रतिशत गिरा है। यही नहीं जिन 46 जिलों में मतदान का प्रतिशत गिरा है, उनमें से प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी समेत कुल 18 जिले ऐसे हैं, जहां 1.04 से लेकर 3.60 प्रतिशत मतदान कम हुआ। यानी इन जिलों में जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं ने मतदाताओं को बूथ तक लाने के लिए उस जोश से काम नहीं किया।
प्रो इन्कम्बैंसी व एंटी इन्कम्बैंसी के बीच हुआ मुकाबला
भाजपा की दुबारा सत्ता में वापसी को भले ही सरकार और संगठन के सामूहिक मेहनत का नतीजा बताया जा रहा है, लेकिन चुनावी माहौल पर नजर डाले तों पाएंगे कि यह चुनाव में एक तरह से सरकार के ‘प्रो इन्कमबैंसी’ और विधायकों के ‘एंटी इन्कम्बैसी’ के बीच हुआ था। जिसमें सरकार की ‘प्रो इन्कमबैंसी’ की जीत हुई है। इससे यह भी स्पष्ट है कि यह चुनाव मोदी और योगी की छवि पर ही हुआ है। देखा जाए तो यह पहला मौका है जब तमाम सांसदों और विधायकों के खिलाफ जनता में घोर नाराजगी थी और जमकर आलोचना हो रही थी। इसके बावजूद पार्टी के नाम जनता ने उनको सिर माथे पर बिठाया।
2024 के लिए सबक भी यह चुनाव
इस चुनाव में कई गलतियां भी हुई हैं, जिसकी संगठन के स्तर पर अनदेखी की गई। मसलन जिस समय भाजपा संगठन के कार्यकर्ताओं को बूथ पर अपने मतदाताओं का नाम आदि सूची में शामिल कराने का काम करना था, सदस्यता अभियान चलाया जा रहा था। तमाम बूथों पर भाजपा के कॉडर माने जाने वाले मतदाताओं के नाम सूची से गायब हो गए। इसलिए माना जा रहा है कि अगर इसी तरह की लापरवाही आगे भी हुई तो 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
मोदी, योगी व अमित शाह ने दिलाई जीत
यह भी कहा जा रहा है कि इस चुनाव में जिस प्रकार का माहौल बना था, उसे अपने पक्ष में करने के लिए मोदी, योगी, अमित शाह और राजनाथ सिंह जैसे नेताओं ने कमान न संभाली होती तो ऐसा परिणाम सामने न होता। पार्टी के सभी शीर्ष नेताओं ने हर दो-तीन जिले की एक संयुक्त रैली करके माहौल को बदलने की पुरजोर कोशिश की। जिसने भाजपा की राह को आसान किया। वहीं योगी ने जिस तरह से 2017 में हारी हुई करीब 82 सीटों पर फोकस करके अपने चुनावी अभियान की शुरूआत की थी, उसका भी खासा असर हुआ।