सियासत के चाणक्य माने जाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी के गढ़ लखनऊ में भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर लगती दिख रही है।
लखनऊ के चुनावी इतिहास और भाजपा की स्थिति का विश्लेषण करें तो यहां कमल खिलने की राह में दुश्वारियां दिखाई देने लगी हैं।
वाजपेयी की विरासत के सहारे सियासत में जगह बनाने की भाजपा नेताओं की आकांक्षा ‘मिशन मोदी’ की उम्मीदों पर भारी पड़ती दिख रही है।
कांग्रेस, सपा और बसपा तीनों ही दलों का अटल के गढ़ में ब्राह्मण चेहरों को उतारना उनकी खास रणनीति का हिस्सा है।
दरअसल, जब से चुनाव प्रक्रिया शुरू हुई है तब से तीन बार को छोड़कर यहां कोई गैर ब्राह्मण चुनाव नहीं जीता। दो बार खत्री और एक बार क्षत्रिय उम्मीदवार इस सीट से जीता। पर, स्थितियां अलग रहीं।
क्षत्रियों में 1989 में कर्मचारी-शिक्षक नेता मान्धाता सिंह जीते। सिंह जब चुनाव जीते थे तब बोफोर्स तोप घोटाले के विरुद्ध माहौल था।
वह खुद साझा विपक्ष के उम्मीदवार थे। भाजपा का भी उन्हें समर्थन था। अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें जिताने की अपील की थी।
पर, यही मान्धाता सिंह 1991 में अटल विहारी वाजपेयी के मुकाबले बुरी तरह हार गए। सिंह को सिर्फ 40 हजार वोट ही मिल पाए।
लोकसभा के पिछले चुनाव में लालजी टंडन जीते तो उससे पहले 1962 में एक अन्य खत्री बीके धवन को जीत मिली।
पर, दोनों के जीतने की अलग वजहें थी। टंडन को स्वाभाविक रूप से अटल की विरासत से जुड़ा माना जाता था।
इसलिए उन्हें उसका लाभ मिला। हालांकि जीत का अंतर काफी कम रहा। धवन जब चुनाव जीते तो उस समय कांग्रेस की लहर थी।
इसे छोड़ दें तो विधानसभा के चुनाव नतीजे हों अथवा लोकसभा, राजधानी के ब्राह्मण, वैश्य, कायस्थ और मुस्लिम वोट ही निर्णायक भूमिका निभाते रहे।
इसका प्रमाण विधानसभा चुनाव में इन वर्गों के चेहरों की जीत है।
राजधानी के यह रहे समीकरण
लोकसभा का 2009 का पहला ऐसा चुनाव था, जो अटल की मौजूदगी के बगैर लड़ा गया। इससे पहले वह हर चुनाव में कभी प्रत्याशी के रूप में तो कभी प्रचारक के रूप में लखनऊ आते रहे।
टंडन जीते तो लेकिन अटल की तुलना में काफी कम मतों के अंतर से।