बिसवां विधायक महेंद्र यादव, पूर्व विधायक रमेश राही हों या फिर पूर्व विधायक मनीष रावत, इन तीनों नेताओं का अब सियासी सफर किस डगर की ओर जाता है, इसे लेकर हर किसी की नजरें इनके अगले कदम की ओर लगी हैं। वजह, जिस पार्टी में ये थे, वहां से तो इस बार तीनों नेताओं को मायूसी ही हाथ लगी है। तीनों लोगों ने टिकट मिलने की ढेरों उम्मीदें लगा रखीं थी लेकिन इनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया है। अब ऐसे में ये पार्टी में ही रहकर निष्ठावान कार्यकर्ता की तरह काम करेंगे या फिर कोई और कदम उठाकर सियासत में गुल खिलाएंगे.... यह अभी कह पाना मुमकिन नहीं है।
दिल के अरमां आंसुओं में बह गए
दिल के अरमां आंसुओं में बह गए, हम वफा करके भी तन्हा रह गए...। यह गीत इन दिनों भाजपा विधायक राकेश राठौर पर पूरी तरह से सटीक बैठ रहा है। 2017 में नगर विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के टिकट से जीते राकेश राठौर को पार्टी की व्यवस्था और नीतियां रास नहीं आईं। वह खुलकर मुखालफत करने लगे। पार्टी में कार्यकाल तो बिताया लेकिन पूरी तरह से खुद को किनारे करते हुए।
इसके बाद पिछले महीनों राकेश राठौर और हरगोविंद भार्गव दोनों विधायकों ने सपा का दामन थाम लिया था। हरगोविंद का पाला बदलना तो उनके लिए मुनाफे का सौदा रहा लेकिन घाटा तो विधायक राकेश राठौर का हो गया। भाजपा भी छोड़ दी और सपा ने टिकट भी नहीं दिया। हालांकि, चर्चाएं टिकट को लेकर थीं लेकिन पार्टी ने नगर विधानसभा क्षेत्र से राधेश्याम को मैदान में उतार दिया।