लखनऊ। फर्जी दस्तवेजों के आधार पर केसीसी स्वीकृत कराकर ऋण का पैसा निकालकर स्टेट बैंक को करोड़ों की चपत लगाने के आरोपी रविराज सिंह, चंद्रशेखर, प्रियंका लोधी, रविशंकर पांडेय और प्रवीण मौर्या की ओर से अलग-अलग दी गई अग्रिम जमानत अर्जी को भ्रष्टाचार निवारण के विशेष न्यायाधीश अजय विक्रम सिंह ने खारिज कर दिया।
कोर्ट में सीबीआई की ओर से तर्क दिया गया कि मामले की रिपोर्ट एसबीआई के रीजनल मैनेजर मनीष उप्पल ने 9 जनवरी 2020 को दर्ज कराई थी। कहा गया था कि शाखा प्रबंधकों कमल कुमार श्रीवास्तव, अंशुल मेहंदीरत्ता और अवधेश कुमार ने सहअभियुक्त प्रकाश चन्द्र विद्यार्थी, अत्र कुमार द्विवेदी उर्फ गोले और अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर 2014 से 2017 के बीच कूटरचित दस्तवेजों के आधार पर 96 केसीसी लोन स्वीकृत कर 6 करोड़ 61 लाख रुपये हड़प लिए। विवेचना के दौरान पता चला कि आरोपी प्रवीण मौर्या, प्रियंका लोधी, चंद्रशेखर और रविराज सिंह ने फर्जी खतौनी और अन्य दस्तावेज लगाए और उन पर अपने हस्ताक्षर कर केसीसी लोन के लिए आवेदन किया।
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रेलवे की जमीन को अपनी बता बेचने वालों को राहत नहीं
लखनऊ। रेलवे की जमीन को अपनी बताकर केनरा बैंक से करोड़ों रुपये का ऋए लेकर हड़पने वाले की मदद करने के आरोपी बैंक के वकील ऋषिराज श्रीवास्तव और मुख्य आरोपी का खाता संचालित करने के आरोपी देवेश कंसल की अलग-अलग दी गई अग्रिम जमानत अर्जी को भ्रष्टाचार निवारण के विशेष न्यायाधीश अजय विक्रम सिंह ने खारिज कर दिया।
सीबीआई की ओर से कहा गया कि केनरा बैंक के जनरल मैनेजर प्रमोद कुमार की शिकायत पर 28 मार्च 2017 को रिपोर्ट दर्ज हुई थी जिसमें बताया गया था कि वर्ष 2014 और 2015 के दौरान केसी इंफ्राबेल्ट ने आलमबाग स्थित बैंक की शाखा से 10 करोड़ की ओसी लिमिट और 70 लाख का टर्म लोन लिया था और 15 जनवरी 2015 तक अधिकतम धन खर्च कर दिया था। खाता 29 सितम्बर 2015 को एनपीए हो गया। कहा गया कि इस पर जांच की गई तो पता चला कि कम्पनी के प्रबंध निदेशक विजय कुमार मिश्रा ने एपी सेन रोड की जिस सम्पत्ति को बैंक के पास गिरवी रखा था, उसका अधिकतर भाग रेलवे की संपत्ति थी और यह संपत्ति रेलवे इलेक्ट्रिफिकेशन के चीफ प्रोजेक्ट मैनेजर के कब्जे में थी।
आगे कहा गया कि विजय कुमार मिश्र ने ऑडी कार खरीदने के लिए केनरा बैंक से ही 70 लाख का एक अन्य लोन लिया था लेकिन ऑडी कार नहीं खरीदी और पैसा हड़प लिया। देवेश कंसल पर आरोप था कि उसने विजय मिश्र द्वारा लिए गए लोन को अलग-अलग खातों में भेजा और अपने खाते में भी 17 लाख 50 हजार रुपये हस्तांतरित किए। आरोपी ऋषिराज श्रीवास्तव पर आरोप है कि वह बैंक का वकील था और आरोपी विजय मिश्र द्वारा लोन लेने के लिए रेलवे की संपत्ति के जो कागजात लगाए गए थे, उसकी फर्जी जांच रिपोर्ट दी थी।