हाथ ढलते गए सांचें में तो थकते कैसे
सीमा जावेद कहती हैं: मेरी मां ने बताया था कि कमला नेहरू यहां पढ़ा करती थीं। शादी से पहले उन्हें देखने पंडित जवाहर लाल नेहरू आए थे। डॉ. हरी नारायण बहादुर कहते हैं कि मेरे ग्रैंड फादर ने अपनी हवेली स्कूल के लिए दी। ज्यादातर कश्मीरी लड़कियां पढ़ने आती थीं। मैंने सुना है कि मेरे पिता जो उस वक्त लगभग सात साल के थे, पढने जाते थे। मेरे पिता अकेले लड़के थे, जो वहां पढ़ते थे। डॉ. रशीदा खान: उस दौर में पढ़ाई के साथ-साथ कई तरह की एक्टीविटीज होती थीं।
नक्श के बाद नए नक्श निखारे हम ने
की ये दीवार बुलंद, और बुलंद और बुलंद
बाम ओ दर और जरा और संवारे हम ने...।
इन पंक्तियों के शब्द, शब्द कश्मीरी मोहल्ला स्थित म्यूनिसिपल गर्ल्स स्कूल की बुलंदी की गवाही देते हैं। हाल ही में द कश्मीर फाइल चर्चा में आई, कश्मीरी पंडितों के दर्द की चुभन भारतीयों ने महसूस की है, देखते ही देखते इस फिल्म ने विश्व का ध्यान आकृष्ट किया। इसमें आह है, पीड़ा है और एक दर्दनाक सच्चाई है। इस बीच अमर उजाला को मिली ‘सुभाषिनी’..., ये 31 मिनट की एक डॉक्यूमेंट्री है, जो बताती है कि अवध ने किस तरह से कश्मीरियों को अपनाया। सिर्फ पनाह ही नहीं दी, बल्कि पर्दाप्रथा के उस सख्त दौर में कश्मीरी परिवार की बेटियों की तरक्की की राह भी खोली।
जी, हां यह डॉक्यूमेंट्री कश्मीरी मोहल्ला स्थित म्यूनिसिपल गर्ल्स स्कूल के स्थापना काल से लेकर अब तक की कहानी बताती है। खास बात है कि इसकी परिकल्पना, शोध, पटकथा और वॉयस ओवर समीना खान का है। अमर उजाला के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस फिल्म का प्रीमियर किया जा रहा है। इसके साथ ही आप इसे अमर उजाला के यूट्यूब चैनल पर जाकर देख सकते हैं।
शोध के नतीजे और परिकल्पना
समीना खान बताती हैं कि कश्मीरी मोहल्ला की तारीख खंगालने पर मिलता है कि 1775 में नवाब आसिफुद्दौला ने जब राजधानी फैजाबाद से लखनऊ की तो बड़ी तादाद में हिंदू-मुस्लिम कश्मीरियों ने भी कूच किया। कश्मीर को अलविदा कह कर आए ये परिवार कहीं भी रहने को राजी थे, बस भी गए। फलते-फूलते परिवारों की बेटियों की तालीम उस वक्त के दौर में बड़ा सवाल थी। पर्दा प्रथा का दौर था वह।
आयरिश लेडी डॉ. एनी बेसेंट और इसी इलाके में रहने वाले जज प. सूरज नारायण पांडेय की संयुक्त पहल पर अस्तित्व में आया यह स्कूल। मकसद था कश्मीरी लड़कियों को रस्मी तालिम देना। इस नेक मकसद से पं. सूरज ने अपनी हवेली में ही एक प्राइमरी स्कूल की शुरुआत का फैसला किया। 15 लड़कियों के दाखिले के साथ स्कूल शुरू हुआ और बेटियों को स्कूल भेजने को लेकर विरोध भी।
कामयाबी की सुनहरी दास्तान लिखते इस स्कूल को मान्यता भी मिली। देखते ही देखते बोर्ड ने इसे मान्यता दी। 1947 में यहां 406 लड़कियां पढ़ रही थीं। 20वीं सदी की शुरुआत में शुरु हुए इस स्कूल ने एक-एक कर नए रिकॉर्ड कायम किए, जिसे वृत्त चित्र में बताया गया है। 1908 में इसे लखनऊ नगर पालिका को सौंपा गया।
इनके साक्षात्कार भी बताते हैं स्कूल के इतिहास को
अपनी परिकल्पना को आकार देते-देते समीना ने कुछ ऐसे लोगों से साक्षात्कार किया, जो इसकी प्रमाणिकता में मददगार बने। उन्होंने स्कूल संस्थापक के पोते डॉ. हरी नारायण बहादुर, पहली भारतीय प्रिंसिपल की नवासी डॉ. राका, पाकिस्तान में रह रही एक पुरानी स्टूडेंट, यहां पढ़ीं एक स्टूडेंट की बेटी डॉ. सीमा जावेद, डॉ. रशीदा खान, राजीव प्रसाद, शहनाज जरीना खान, आकला हसन, पाकिस्तान से सुल्ताना ख्वाजा, कनाडा से शकीला कमर से बात की।
एक शुरुआत की और बन गया कारवां....
समीना खान ने बताया कि हम लोगों की एक संस्था है सुखन चौखट, जो साहित्य पर काम करती है। इसमें चार सदस्य हैं। मेरे अलावा सीमा सिंह, शालिनी सिंह और नीतू रावत इससे जुड़े हैं। इसी के बैनर तले हमने इस डॉक्यूमेंट्री को बनाया है। वीडियो प्रोडक्शन के लिए हमें ब्रिसपार्क के क्रिएटिव डायरेक्टर और फिल्म मेकर मृत्युंजय सिंह और ब्रिसपार्क के डायरेक्टर और लेखक प्रियांशु एपी सिंह का सहयोग मिला। मृत्युंजय ने बताया कि मैं एक निजी विश्वविद्यालय से मॉस कॉम कर रहा हूं और प्रियांशु सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है। हम दोनों ही कुछ सीखना चाहते थे, कुछ नया करना चाहते थे और इसका माध्यम समीना मैम बनीं। समीना के मुताबिक, इस कार्य को अंजाम तक पहुंचाने में सोशल एक्टिविस्ट नाइस हसन का भी सहयोग रहा।
समीना बोली : कहीं नहीं आड़े आया हिजाब
फिल्म अमर उजाला को सौंपते हुए और इसे तैयार करने के पीछे की कहानी सुनाते हुए समीना खान ने कहा कि बीते आठ-10 सालों से मैं हिजाब कर रही हूं। इस पूरी फिल्म को मैंने अपने हिजाब के साथ पूरा किया है और मुझे खुशी है कि यह मेरे आगे बढ़ने में कहीं भी आड़े नहीं आया। इसकी मुझे तसल्ली भी है।