सूबे की सरकार के छोटे वजीरों का अपना दर्द है। गाहे-बगाहे इसे जाहिर भी करते रहते हैं, कुछ तो सीएम के पास तक भी पहुंच गए।
गाड़ी-घोड़ा, दफ्तर और स्टाफ है लेकिन, काम कुछ नहीं। कहने को राज्यमंत्री लेकिन कोई फाइल उनके सामने आती नहीं। विभागीय मामलों में दखल भी नाममात्र का। कुछ सीनियर मिनिस्टर तो जूनियर वजीरों को भाव तक नहीं देते।
वेस्ट यूपी से ताल्लुक रखने वाले एक छोटे वजीर का दर्द छलका तो बहुत कुछ कह गए। बोले, महकमे की बात छोड़िए, सुनवाई कहां हो रही है। जिले से लेकर पांचवें तल तक एक जैसा हाल है।
विधायक थे तो लड़-झगड़कर काम करा लेते थे। लाल बत्ती क्या मिली प्रोटोकॉल आड़े आने लगा। पद की गरिमा के नाम पर सब कुछ सुनना पड़ता है।
क्षेत्र के लोग समझते हैं, मंत्री है, जो कहेंगे हो जाएगा। हो रहा है उल्टा। चुनावी साल में लोगों की उम्मीदों पर खरा न उतरे तो जनता हिसाब बराबर करने में देर नहीं लगाएगी।
हाल यह हैं कि मंत्री पद का दर्जा प्राप्त नेता अपने और दूसरों के काम कराए जा रहे हैं। पर, चूंकि वे हस्तिनापुर से बंधे हैं, अपना दर्द किसी को कह भी नहीं पा रहे।