दिवाकर त्रिपाठी कहते हैं कि अगर अभी शहर का विस्तार न किया जाता तो जो कॉलोनियां शहीद पथ के किनारे, आउटर रिंग रोड के किनारे और शहर के अन्य बाहरी इलाकों में तेजी से बस रही हैं वे नियोजित विकास के अभाव में स्लम बन जाएंगी।
अभी शामिल करने से यह है कि कम से कम यहां पेयजल, जल निकासी, सीवर, सफाई की सुविधाएं तो व्यवस्थित हो जाएंगी। वहीं, अभी डिफेंस एक्सो को लेकर भी शहर में विकास कार्य हो रहे हैं। इसका फायदा भी इन गांवों को मिल जाएगा। कानपुर कॉरीडोर के विकास में भी काफी सहूलियत सीमा विस्तार से होगी।
नगर निगम और जनता दोनों का फायदा
सीमा में 88 गांव शामिल करने को लेकर दिवाकर त्रिपाठी का मानना है कि इससे नगर निगम और गांववालों दोनों का फायदा है। नगर निगम को जहां अब इनसे टैक्स मिलने लगेगा, वहीं गांववालों को भी नगर निगम से जनसुविधाएं मिलेंगी।
अब गोमतीनगर विस्तार का खरगापुर गांव हो या एलडीए की गोमतीनगर विस्तार योजना, वहां से नगर निगम को टैक्स नहीं मिलता है। हालांकि, यहां के लोग नगर निगम की सुविधाओं का उपयोग करते ही हैं, क्योंकि ये इलाके शहर के अंदर आ चुके हैं। अब इनसे जहां निगम को टैक्स मिलेगा तो लोगों को सभी तरह की सुविधाएं।
पूर्व महापौर दाऊजी गुप्ता कहते हैं कि शहर का दायरा बढ़ाने से कुछ नहीं होगा। अभी तक उन गांवों को पूरी सुविधाएं नहीं मिल पाईं, जो 1987 में नगर निगम में शामिल हुए थे। निगम की सीमा बढ़ाने से जनता को फायदा नहीं होगा। इससे सिर्फ नगर निगम को टैक्स मिलेगा और सरकार का राजस्व बढ़ेगा।
अभी जहां गांव के आधार पर कम टैक्स लग रहे हैं, वहां शहर के आधार पर अधिक टैक्स लगेंगे। वहीं, प्रदेश सरकार के रुख से दो नगर निगम बनाने जैसा कुछ नहीं लगता। अगर ऐसा करना होता तो सरकार सीमा विस्तार के साथ इसका भी प्रस्ताव पास करती।
जोनल व्यवस्था को बनाना होगा मजबूत
दाऊजी गुप्ता का मानना है कि सीमा विस्तार के बाद अब जोनल व्यवस्था को प्रभावी बनाने की जरूरत होगी। जोनों की संख्या बढ़ाने के साथ यहां तैनात होेने वाले अधिकारी को इतने अधिकार देने होंगे, ताकि वह जोनल स्तर पर ही जनता की सुविधाओं से जुड़े निर्णय ले सके।
यह न हो कि अभी की तरह हर छोटे काम के लिए उसे मुख्यालय तक दौड़ना पड़े।
पूर्व नगर आयुक्त व सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी मधुसूदन रायजादा कहते हैं कि सीमा विस्तार के बाद दो नगर निगम बनाए जाने चाहिए। इससे काम-काज में बहुत सुधार होगा। पूना का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां ऐसा करने से कामकाज बहुत बेहतर हुआ है।
वहीं, दो नगर निगम बनाने पर खर्च बहुत ज्यादा नहीं आएगा। नगर स्वास्थ्य अधिकारी, मुख्य अभियंता सिविल और मुख्य अभियंता विद्युत यांत्रिक जैसे पद दोगुने होंगे। बाकी सारी व्यवस्थाएं जोन बढ़ाने पर करनी ही होंगी। जब दो नगर निगम होंगे तो जगह कें द्रीय कार्यशाला होगी।
इससे गाड़ियों को इलाके में जाने में कम समय लगेगा और ईंधन भी बचेगा। गाड़ियां समय से निकलेंगी तो सफाई व्यवस्था में सुधार होगा। दो नगर निगम होने से खर्च भी कम होगा।
तीन साल से हो रही दो नगर निगम बनाने की मांग
नगर निगम की सीमा विस्तार की कवायद शुरू होने के बाद से ही ट्रांसगोमती और सिस गोमती नगर निगम बनाने की मांग हो रही है। पूर्व पार्षद और कांग्रेस नेता शैलेंद्र तिवारी बब्लू इसकी मांग कर चुके हैं। गोमती नगर जनकल्याण महासमिति ने भी दो नगर निगम बनाने की मांग की है। इसे लेकर वह सांसद राजनाथ सिंह को मांग पत्र भी दे चुकी है।
सीमा विस्तार के साथ वार्डों के परिसीमन की भी चर्चा तेजी से शुरू हो गई है। दो नगर निगम बनें या वार्ड बढ़ें, दोनाें ही सूरत में वार्डों का परिसीमन होना तय है। नए गांव आने से आबादी बढ़ेगी और फिर उसी के आधार पर वार्डों की आबादी में बदलाव करना होगा।
इसकी आशंका को लेकर पार्षदों में चर्चा शुरू हो गई है। कुछ जहां इससे खुश तो कुछ मायूस हैं। कुछ पार्षद तो अब दो-दो सीटों पर कब्जा जमाने की तैयारी करने की सोच रहे है। इसके लिए वह खुद के साथ पत्नी या परिवार के अन्य सदस्य को चुनाव लड़ाने की योजना बना रहे हैं।
अभी नहीं हो सकते 110 से अधिक वार्ड
नगर निगम अधिनियम में प्रावधान के तहत वार्डों की संख्या अधिकतम 110 हो सकती है और यहां अभी इतने वार्ड हैं। ऐसे में यदि दो नगर निगम नहीं बनाए गए तो शासन को अधिनियम में संशोधन कर वार्डों की अधिकतम संख्या की सीमा 110 से बढ़ानी होगी।
- पहले से करीब दस हजार सफाई कर्मचारियों की कमी से जूझ रहे नगर निगम प्रशासन को इतने ही और कर्मियों की जरूरत होगी।
- सीमा विस्तार का नोटिफिकेशन होने के बाद नगर निगम को जो गांव मिलेंगे वहां अतिक्रमण, कब्जे आदि समस्याओं से भी नगर निगम को जूझना होगा। पहले से जो गांव हैं उनमें यह समस्या अब तक बनी है।
- नगर निगम की गृहकर व अन्य मदों से अभी सालाना करीब 500 करोड़ रुपये की आय है। इसमें से करीब 400 करोड़ वेतन, भत्तों में खर्च हो जाते हैं। ऐसे में अब जो नए गांव आएंगे उनमें हाउस टैक्स के भरोसे विकास कार्य पूरे नहीं हो पाएंगे। इसके लिए अवस्थापना और राज्य वित्त आयोग से अधिक बजट की दरकार होगी।
- जल निकासी, पेयजल पाइप लाइन बिछाने और सीवर सिस्टम का काम अभी 70 प्रतिशत शहर में ही है। यह तब है जब जेएनएनयूआरएम योजना पूरी हो चुकी है और अब अमृत मिशन योजना चल रही है। ऐसे में नए गावों में इन अवस्थापना सुविधाओं को पहुंचाना एक बड़ी चुनौती होगी।