जेंडर बायसनेस किसी भी रूप में गलत है। ऐसा करके आप किसी भी व्यक्ति के सेल्फ स्टीम पर आघात करते हैं।
- फोटो : सोशल मीडिया
'मेरी दो बहनें हैं। एक बड़ी हैं एक मुझसे छोटी। जब बड़ी बहन शादी होकर गई तो लोगों ने मुझे इस तरह की बातें कही- अब कहां भागोगे बेटा, अब तो दौड़-दौड़ कर काम करने पड़ेंगे या बेटा अब तक रेणु (मेरी बड़ी बहन) सारी जिम्मेदारियां निभा रही थी, अब पता नहीं तुम सम्भाल सकोगे या नहीं।'कहते हैं राजेश।
राजेश बताते हैं-' मैंने मन में सोचा, अब तक हर काम में दीदी के पीछे-पीछे मैं ही भागता था। आगे भी मैं करुंगा ही। इसमें नया क्या होगा। लेकिन मैं चुप रह गया। यहां तक तो ठीक था। फिर छोटी बहन की शादी तक मेरी शादी भी हो चुकी थी। यहां लोगों की सलाह और भी अजीब हो गई। मैंने अपने पापा के एक बहुत अच्छे मित्र को पापा से कहते सुना।
अरे, अब तो बिटिया भी चली गई। ठंडा खाना खाने और बेकद्री की आदत डाल लो। जो ऐश करने थे, बेटियों के राज में कर लिए। मुझे ये सुनकर झटका लगा। ये वही अंकल थे, जो मुझे बचपन से जानते थे। हालांकि पापा ने उनकी बात सुनते ही कहा- अरे नहीं ऐसा नहीं है। मेरे तो बहु-बेटे के राज में भी ऐश हैं। ये सुनकर मैं थोड़ा रिलैक्स्ड हुआ, लेकिन लोगों की ये सोच मन मे कड़वाहट तो पैदा करती ही है।'
न करें बेवजह की तुलना
जेंडर बायसनेस किसी भी रूप में गलत है। ऐसा करके आप किसी भी व्यक्ति के सेल्फ स्टीम पर आघात करते हैं। लड़का हो या लड़की अपनी जिम्मेदारियों के प्रति उसका सतर्क और समर्पित होना, उसकी ग्रूमिंग, आस पास के माहौल और उसकी अपनी सोच पर भी निर्भर करता है। ऐसे में केवल लड़कों को जिम्मेदारी के स्तर पर कमतर या गलत ठहराना उन लोगों के ऊपर भी उंगली उठाना है, जिन्होंने अपने पैरेंट्स या अपनी जिम्मेदारियों के चलते खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया है।