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घर-दहलीज की बदलती कहानियां: "अच्छा हुआ बेटी हुई, बेटे तो धोखेबाज होते हैं", यह सुनकर मैं अवाक् था..!

सार

जेंडर बायसनेस किसी भी रूप में गलत है। ऐसा करके आप किसी भी व्यक्ति के सेल्फ स्टीम पर आघात करते हैं। लड़का हो या लड़की अपनी जिम्मेदारियों के प्रति उसका सतर्क और समर्पित होना, उसकी ग्रूमिंग, आसपास के माहौल और उसकी अपनी सोच पर भी निर्भर करता है। स्वाति शैवाल बता रही है कैसे बदल रहा है समाज 
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मैं सपने में मां-बाप को छोड़ने या उन्हें धोखे के बारे में नहीं सोचता, फिर लोग क्यों कह रहे हैं ऐसा? - फोटो : iStock
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विस्तार
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महिलाओं को आगे बढ़ाने और उनके हितों की बात करना जरूरी है, लेकिन इसके लिए हर बात में पुरुषों पर ब्लेम करना या उनके हितों की बात न करना पक्षपाती है। पिछले कुछ समय में लगातार समाज में लड़कों या पुरुषों को कमतर ठहराने का एक चलन से चल पड़ा है। क्या यह सही है?

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पंकज के घर में कुछ दिनों पहले ही नवजात के रूप में खुशियां आई हैं। पूरे परिवार में खुशी का माहौल है। पंकज कहते हैं- 'इतनी खुशी के बीच भी कुछ लोगों की बातें आपको सोचने पर मजबूर कर देती हैं। मैंने या मेरे परिवार में किसी ने भी यह नहीं सोचा था कि बेटा होगा या बेटी। हम बस यही प्रार्थना कर रहे थे कि सबकुछ अच्छे से हो जाए और मां-बच्चा दोनों स्वस्थ रहें। लेकिन मेरी बिटिया के जन्म के बाद जो बधाईयां मिलीं, उनमें से कुछ बहुत ही अजीब थीं।

मेरे एक परिचित ने बधाई देते हुए कहा- अच्छा हुआ बेटी हुई। बेटे तो धोखेबाज होते हैं। एक का कहना था कि बेटे तो मां-बाप को छोड़ जाते हैं, केवल बेटियां ही देखभाल करती हैं। मैं यह सब सुनकर शॉक्ड भी था। मैं भी अपने माता-पिता का इकलौता बेटा हूं। मेरी बड़ी बहन विदेश में अपने परिवार के साथ रहती हैं। मैं तो सपने में भी अपने माता-पिता को छोड़ने या धोखा देने के बारे में नहीं सोच सकता। फिर लोग ऐसा क्यों सोचते हैं?' 

धारणा बदली या पक्षपाती हुई 

पिछले कुछ सालों में लड़कियों को लेकर समाज की सोच बदली है। लड़कियों को आगे बढ़ने के भरपूर मौके भी मिलने लगे हैं, लेकिन इसके साथ ही एक और धारणा भी सिर उठाने लगी है। यह धारणा है लड़कों को कमतर ठहराने की। अगर आप समाज की संरचना या सोच को देखें तो घर चलाने से लेकर समाज में जगह बनाने तक का मुख्य भार अब भी पुरुषों पर ही ज्यादा है। उन्हें एक अच्छी नौकरी से लेकर, अच्छे स्तर की जीवनशैली को मेंटेन रखने तक कई दबावों से गुजरना पड़ता है। उस पर यह नया फंडा कि लड़के पैरेंट्स के प्रति जिम्मेदारी को नहीं समझते या लड़के साथ छोड़ जाते हैं, लड़कियां ही साथ निभाती हैं, यह भी निगेटिव है। 

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जेंडर बायसनेस किसी भी रूप में गलत है। ऐसा करके आप किसी भी व्यक्ति के सेल्फ स्टीम पर आघात करते हैं। - फोटो : सोशल मीडिया
'मेरी दो बहनें हैं। एक बड़ी हैं एक मुझसे छोटी। जब बड़ी बहन शादी होकर गई तो लोगों ने मुझे इस तरह की बातें कही- अब कहां भागोगे बेटा, अब तो दौड़-दौड़ कर काम करने पड़ेंगे या बेटा अब तक रेणु (मेरी बड़ी बहन) सारी जिम्मेदारियां निभा रही थी, अब पता नहीं तुम सम्भाल सकोगे या नहीं।'कहते हैं राजेश।
 
राजेश बताते हैं-' मैंने मन में सोचा, अब तक हर काम में दीदी के पीछे-पीछे मैं ही भागता था। आगे भी मैं करुंगा ही। इसमें नया क्या होगा। लेकिन मैं चुप रह गया। यहां तक तो ठीक था। फिर छोटी बहन की शादी तक मेरी शादी भी हो चुकी थी। यहां लोगों की सलाह और भी अजीब हो गई। मैंने अपने पापा के एक बहुत अच्छे मित्र को पापा से कहते सुना।

अरे, अब तो बिटिया भी चली गई। ठंडा खाना खाने और बेकद्री की आदत डाल लो। जो ऐश करने थे, बेटियों के राज में कर लिए। मुझे ये सुनकर झटका लगा। ये वही अंकल थे, जो मुझे बचपन से जानते थे। हालांकि पापा ने उनकी बात सुनते ही कहा- अरे नहीं ऐसा नहीं है। मेरे तो बहु-बेटे के राज में भी ऐश हैं। ये सुनकर मैं थोड़ा रिलैक्स्ड हुआ, लेकिन लोगों की ये सोच मन मे कड़वाहट तो पैदा करती ही है।'

न करें बेवजह की तुलना 

जेंडर बायसनेस किसी भी रूप में गलत है। ऐसा करके आप किसी भी व्यक्ति के सेल्फ स्टीम पर आघात करते हैं। लड़का हो या लड़की अपनी जिम्मेदारियों के प्रति उसका सतर्क और समर्पित होना, उसकी ग्रूमिंग, आस पास के माहौल और उसकी अपनी सोच पर भी निर्भर करता है। ऐसे में केवल लड़कों को जिम्मेदारी के स्तर पर कमतर या गलत ठहराना उन लोगों के ऊपर भी उंगली उठाना है, जिन्होंने अपने पैरेंट्स या अपनी जिम्मेदारियों के चलते खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया है। 
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