एक समय था जब चिकनगुनिया के गिने-चुने मामले ही देखने को मिलते थे, लेकिन अब यह बीमारी पूरी दुनिया में अपने पांव पसार चुकी है। भारत के अधिकांश राज्यों में इसके मामले देखने को मिलते हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने भारत में चिकनगुनिया के संक्रमण से संबंधित एक सर्वे रिपोर्ट जारी किया है, जिसे 'द लैंसेट' पत्रिका में भी प्रकाशित किया गया है। कहा जा रहा है कि इस शोध की मदद से इस वायरस से लड़ने में और इस बीमारी के खिलाफ भविष्य में टीके के परीक्षण में भी काफी मदद मिलेगी।
इस सर्वे के लिए तीन आयु समूहों (5-8, 9-17 और 18-45 वर्ष) में व्यक्तियों का चयन किया था। इसमें भारत के पांच भौगोलिक क्षेत्रों (उत्तर, उत्तर-पूर्व, पूर्व, दक्षिण और पश्चिम) के लोग शामिल थे। इस सर्वे में पाया गया कि पूर्वी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों की तुलना में भारत के दक्षिणी, पश्चिमी और उत्तरी क्षेत्रों में चिकनगुनिया का प्रसार अधिक था।
हालांकि, सर्वे से पता चलता है कि भारत के पूर्वी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में भविष्य में चिकनगुनिया का प्रकोप बढ़ सकता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि हमारे सर्वेक्षण के निष्कर्ष भविष्य में चिकनगुनिया की वैक्सीन के परीक्षणों के लिए उपयुक्त आयु समूहों और साइटों की पहचान करने में उपयोगी होंगे।
दरअसल, चिकनगुनिया बीमारी का फिलहाल कोई इलाज नहीं है, यानी यह एक लाइलाज बीमारी है और ना ही इसके खिलाफ कोई टीका बना है। हालांकि चिकनगुनिया के खिलाफ एक सीरोलॉजिकल परीक्षण उपलब्ध है, जिसे मलयेशिया के मलाया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने विकसित किया है।
इस बीमारी से बचने का सबसे प्रभावी तरीका रोग के वाहक मच्छरों के संपर्क मे आने से बचना है। दरअसल, चिकनगुनिया वायरस इंसानों में एडिस मच्छर के काटने से प्रवेश करता है। इसके लक्षण ठीक डेंगू वाले लक्षण (अचानक तेज बुखार आना, जोड़ों में दर्द, मांसपेशियों में दर्द, सिरदर्द, मतली, थकान और त्वचा पर लाल चकत्ते) की तरह ही होते हैं। इसलिए कभी-कभी इस बीमारी के लक्षणों को डेंगू के लक्षण समझने की गलती भी हो जाती है।