श्रीनगर/सोपोर। कश्मीर में एक महीने के भीतर हुई पांच गैर कश्मीरी श्रमिकों समेत 11 नागरिकों की हत्याओं के बाद से घाटी से दूसरे राज्य के लोगों में डर का माहौल है। मंगलवार को भी इन लोगों का घाटी छोड़कर अपने घरों को लौटने का सिलसिला जारी रहा। श्रीनगर के टूरिस्ट रिसेप्शन सेंटर (टीआरसी) पर सुबह से ही कई कामगार अपना सामान लेकर पहुंच गए। ये सभी जम्मू के लिए गाड़ियों में निकले हैं। सभी के चेहरों पर खौफ देखा जा सकता था। इस दौरान कइयों की आंखें नम हो गईं। इन कामगारों का कहना है कि कश्मीर वर्षों से उनका दूसरा घर रहा है। उनके सामने अब भविष्य का भी सवाल है। कितने लोगों ने घाटी छोड़ी इसका आधिकारिक आंकड़ा तो नहीं है लेकिन अनुमान है कि लगभग एक हजार श्रमिक व उनके परिजन मंगलवार को यहां से रवाना हुए।
श्रीनगर के डाउनटॉउन इलाके के खानयार में दर्जी का काम करने वाले मोहम्मद इब्राहिम अपनी पत्नी और तीन छोटे बच्चों के साथ तड़के ही टीआरसी में गाड़ी का इंतजार करते दिखाई दिए। जैसे ही एक गाड़ी वहां आई तो उन्होंने चालक के साथ बातचीत कर बच्चों और परिवार के अन्य सदस्यों को उसमें बिठाया। अपने कारखाने का सामान गाड़ी में भर कर रवाना हो गए। जाने से पहले उन्होंने बताया कि वह पिछले 15 वर्षों से यहां रह रहे थे। अच्छे से कारोबार चल रहा था। पहले अकेले यहां आए थे, लेकिन जब सब काम जम गया तो परिवार को भी साथ ले आए। इब्राहिम ने कहा कि जो हालात अब बने हैं पहले कभी नहीं देखे, इसलिए डर के चलते लौटना पड़ रहा है। हमारा मालिक मकान अच्छा था उसने आश्वासन दिया कि बाकी सामान वह सुरक्षित रखेगा और हालात ठीक होने पर जब लौटेंगे तब फिर से काम शुरू करेंगे।
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ठेकेदार के पास फंसे पैसे मिलते ही घर लौटेंगे
श्रीनगर ही नहीं बल्कि दक्षिण और उत्तरी कश्मीर से भी लगातार दूसरे राज्य के लोग घाटी छोड़ रहे हैं। ग्रामीण इलाकों से तो रात में भी बसों में ये लोग लौट रहे हैं। एक टैक्सी ऑपरेटर के बताया कि करीब 700 लोग टीआरसी से रवाना हुए हैं। कुछ ऐसे भी हैं, जो काम कर रहे थे और उनका पैसा फंसा हुआ है। बिहार निवासी पेंटर दिलीप ने बताया कि वह कश्मीर में एक महीने से एक जगह काम कर रहे थे। काम खत्म हो चुका है, लेकिन ठेकेदार ने पैसे नहीं दिए। जैसे ही पैसे मिलते हैं तो वे भी यहां से लौट जाएंगे।
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भविष्य को लेकर चिंता
एक कपड़ा दुकान पर काम करने वाला सूरज पहले ही अपना बैग पैक कर चुका है और जल्द ही घाटी से निकलने के लिए तैयार है। उसने कहा मुझे पता नहीं है आगे क्या होगा क्योंकि इस दुकान से मैं अपनी आजीविका कमाता था और मेरा मालिक भी अच्छा था।
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मालिक तो अच्छे हैं, पर 24 घंटे साथ नहीं रह सकते
यूपी के हापुड़ के रहने वाले जावेद यहां एक सैलून में काम करते हैं। वह भी जाने की योजना बना रहे हैं। जावेद कहते हैं कि यहां कि फिजाओं में अब डर लगता है। मेरे मालिक मेरा बहुत ख्याल रखते हैं लेकिन वह 24 घंटे मेरे साथ नहीं रह सकते। अब मुझे नए सिरे से कुछ शुरू करना होगा।
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सोपोर में फल व्यवसायी आए आगे, भरोसा देकर 200 कामगारों को रोका
एशिया की सबसे बड़ी फ्रूट मंडी पर भी कश्मीर से बाहर के मजदूरों और व्यवसायियों के लौटने से भी कारोबार प्रभावित होने की आशंका है। फल सीजन होने के चलते कारोबार पर मंडरा रहे संकट को ध्यान में रखते हुए स्थानीय व्यवसायी सामने आए हैं। उनके द्वारा बाहर से यहां मजदूरी व अन्य कारोबार करने आए लोगों को पूर्ण सुरक्षा का आश्वासन दिया जा रहा है। उनसे अपील की जा रही है कि वे घाटी छोड़कर न जाएं। इस बीच स्थानीय व्यवसायियों के आश्वासन पर करीब 200 लोगों ने यहीं रुकने का फैसला किया है।
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इनसेट...
सगीर का बेटा बोला, कश्मीर के हालात जाने लायक नहीं और यहां काम नहीं
एजेंसी।
श्रीनगर/सहारनपुर। दक्षिण कश्मीर में पिछले शनिवार को आतंकियों द्वारा सहारनपुर के रहने वाले सगीर अहमद की हत्या के बाद अब उनके परिवार के समक्ष अस्तित्व का संकट पैदा हो गया है। सगीर के बेटे 28 वर्षीय जहांगीर के सामने चिंता है अब वह परिवार का पालन कैसे करेगा।
जहांगीर कहते हैं कि अभी तक वह अब्बा (पिता) के साथ मिलकर घर चलाते थे। लेकिन अब मैं सोच रहा हूं कि क्या करूं ? क्योंकि यहां ज्यादा काम नहीं है और मैं वहां (कश्मीर) जाकर काम करने के बारे में सोच नहीं सकता।
सगीर के छोटे भाई नसीम बताते हैं कि शनिवार को हमें फोन आया कि सगीर भाई नहीं रहे, और हमें जम्मू से उनका शव लेने के लिए कहा गया। हम तत्काल रवाना हुए और उनका शरीर यहां ले आए। परिवार को इस बात का मलाल है कि जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने शव भेजने की कोई व्यवस्था नहीं की।
एक बच्ची का पिता जहांगीर बताता है कि वह पिता सगीर के साथ मिलकर लगभग 15000 रुपये प्रति माह की आय कमाते थे, लेकिन अब उनकी मृत्यु के बाद पता नहीं कि परिवार को एक साथ कैसे संभाला जाए। वह बताते हैं कि उनके पिता सगीर कश्मीर में काम करके बहुत खुश थे और अकसर अपने नियोक्ता की तारीफ करते थे। जिन्होंने क्रिकेट बैट और लकड़ी के अन्य सामान बनाने के लिए उनकी सेवाओं का इस्तेमाल किया।
पुलवामा में 16 अक्तूबर को सगीर की मौत के अगले दिन कुलगाम में दो और गैर कश्मीरी श्रमिकों की हत्या से दूसरे राज्य के कामगारों में दहशत का माहौल है। लोग अपने गृह जिलों को लौट रहे हैं। एक अधिकारी ने बताया कि सामान्य तौर पर गैर कश्मीरी कामगार सेब के बागों, गत्ते और क्रिकेट बैट बनाने वाली फैक्ट्रियों में छह माह काम करने के बाद अपने घरों को लौटते थे। एक सुरक्षा अधिकारी ने दावा किया कि दक्षिण कश्मीर से करीब 600 लोग सुरक्षित स्थानों की ओर जा चुके हैं।