इस मंदिर को जामवंत गुफा के नाम से भी जाना जाता है। जम्मू नगर के पूर्वी छोर पर बना हुआ है। इस गुफा में कई पीरों, फकीरों, और ऋषियों ने तपस्या की इस कारण से इसका नाम पीर खोह् पढ़ गया। डोगरी भाषा में इसे खोह् गुफा भी बोलते है।
कहते है कि राम रावण के युद्ध में जामवंत भगवान राम की सेना के सेनापति थे। युद्ध की समाप्ति के बाद भगवान राम जब जब से विदा होकर अयोध्या लौटने लगे तो जामवंत जी ने उनसे कहा प्रभु युद्ध में सबको लड़ने का अवसर मिला परंतु मुझे अपनी वीरता दिखाने का कोई अवसर नहीं मिला। मैं युद्ध में भाग नहीं ले सका और युद्ध करने की मेरी इच्छा मेरे मन में ही रह गई।
उस समय भगवान ने जामवंत जी से कहा, तुम्हारी ये इच्छा अवश्य पूर्ण होगी जब मैं कृष्ण अवतार धारण करूंगा। तब तक तुम इसी स्थान पर रहकर तपस्या करो। इसके बाद जब भगवान कृष्ण अवतार में प्रकट हुए तब भगवान ने इसी गुफा में जामवंत से युद्ध किया था।
एक कथा के अनुसार राजा सत्यजीत ने सुर्य भगवान की तपस्या की तो भगवान ने प्रसन्न होकर राजा को प्रकाश मणि प्रसाद के रूप में दे दी। राजा का भाई मणि को चुराकर भाग गया पर जंगल में शेर के हमले में मारा गया और शेर ने मणि धारण कर ली। इसके बाद जामवंत ने युद्ध में शेर को हराकर मणि प्राप्त की। कृष्ण से हारने के बाद ये मणि जामवंत ने कृष्ण को दे दी।
यहीं से कृष्ण और जामवंत फिर से मिले। जामवंत ने कृष्ण को अपने घर आमंत्रित किया यहीं पर जामवंत ने कृष्ण के समक्ष अपने पुत्री सत्य भामां से विवाह का अनुरोध किया और दहेज स्वरूप प्रकाश मणि दी।
पीर खोह् तक पहुंचने के लिए श्रद्धालु मुहल्ला पीर मिट्ठा के रास्ते गुफा तक जाते है। मंदिर की दीवारों पर देवी देवताओं के मनमोहक चित्र उकेरे गए हैं। आंगन में शिव मंदिर के सामने पीर पूर्णनाथ और पीर सिंधिया की समाधिंया हैं। जामवंत गुफा के साथ एक साधना कक्ष का निर्माण किया है।
जो तवी नदी के तट पर स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मंदिर में एक शिवलिंग स्थापित है। यह गुफा घने जंगलो के बीच स्थित है। स्थानीय लोग मानते है कि यह मंदिर भारत के बाहर के मंदिरों और गुफाओं से जुड़ा हुआ है। हजारों भक्त हर साल यहां के मंदिर में पूजा करने आते है।