भारत- पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे गांव की गलियां सूनी हो गईं हैं, घरों में ताले लटक रहे हैं। हर तरफ पाकिस्तानी गोलों की दहशत है। पाकिस्तान ने अब हद कर दी है। पहले सीमा पार के गोले डेढ़ किलोमीटर के दायरे को छलनी करते थे।
अब उनका रेंज बढ़ गया है और मोर्टार की मार चार किलोमीटर की परिधि में आने वाले गांवों को तबाह कर रही है। इस इलाके में रात भर पाकिस्तानी गोलों की गूंज सुनाई पड़ती है और उजाले में बरबादी का गहरे निशान चारों तरफ बिखरे दिखते हैं।
पाक की इस नापाक करतूत के बावजूद ग्रामीणों ने हिम्मत नहीं हारी थी, लेकिन, जब दुश्मन के गोलों ने जानमाल को निशाना बनाना शुरू किया तो उनके हौसले टूट गए। सीमांत ग्रामीणों ने पलायन शुरू कर दिया।
पाक गोलाबारी के कारण प्रशासन ने 27 गांव खाली कराए
स्थिति की गंभीरता को भांपकर प्रशासन भी हरकत में आया और बार्डर के 27 गांव खाली करा दिए गए। शुक्रवार की रात एक बजे से लेकर शनिवार की सुबह आठ बजे तक पाक लगातार बड़े गोले बरसाता रहा जिसमें दो लोगों की जानें गईं और बीएसएफ जवान समेत पांच घायल हुए। एक गाय मर गई। बछड़ा और पालतू कुत्ता घायल हैं।
आरएसपुरा से सीमा की ओर बढ़ते हुए राह में सुचेतगढ़, विधिपुर, चंडूचक, अब्दुल्लियां, घराना, गरानी, बेगा, बेरा, कोटली, मीरादयानी और फलौरा गांवों के खेत पाकिस्तानी मोर्टार से पटे पड़े हैं।
इनमें से कई दग चुके हैं और कई अब तक घातक हैं। इन्हें खोजकर निष्क्रिय करने का अभियान अभी शुरू भी नहीं हो पाया है।
तीन कैंपों में पांच हजार शरणार्थी
आरएसपुरा के तीन शरणार्थी कैंपों में लगभग पांच हजार ग्रामीणों को ठहराया गया है। आईटीआई कैंपस में अब्दुल्लियां गांव के लोग हैं तो रंगपुर मलेलियन के गर्ल्स हाई स्कूल में करोटोना और नई बस्ती के ग्रामीणों को पनाह मिली है।
थोड़ी दूर ब्वायज स्कूल में विधिपुर के ग्रामीणों का डेरा है। करोटोना के दर्शन लाल को पाकिस्तान के साथ-साथ अपनी सरकार पर भी गुस्सा है। वह कहते हैं 1947 से अब तक सरकारें ढ़पोरशंखी घोषणाएं करती रहीं हैं।
वास्तविकता तो यह है कि हम तब भी शरणार्थी थे और अब भी शरणार्थी ही हैं। सुविधाएं और हक तो मिला नहीं, उल्टे हर वक्त सिर पर मौत मंडराती रहती है। नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद यह लगा था कि अब पाक को करारा जवाब मिलेगा, लेकिन, पाकिस्तानी अपनी हरकतों से अब भी बाज नहीं आ रहा।
मवेशियों को चारा डालने वाला कोई नहीं
बार्डर के 27 गांवों में मवेशियों को चारा डालने वाला भी कोई नहीं बचा है। भारत और पाक के बीच सचिव स्तर की वार्ता रद्द होने के बाद एक दिन गोलाबारी बंद हुई थी।
दूसरे दिन से पाकिस्तानी मोर्टार फिर गरजने लगे। ग्रामीणों ने दो रातें बंकरों में गुजारीं, लेकिन, जब जान पर बन आई तो गांव छोड़ दिया।
नई बस्ती की सोमा देवी अपनी गाय की मौत पर बिलख पड़ी। गाय का दूध बेचकर ही उसके घर का गुजारा चलता था जिसे पाक गोलाबारी ने छीन लिया।