जम्मू-कश्मीर में तीन दशक से आतंकवाद को बढ़ावा देने में जुटा पाकिस्तान अपनी साजिशों को अंजाम देने के लिए रणनीति में बदलाव कर रहा है। वह अब फिर से धर्म का सहारा ले रहा है। धर्म के नाम पर स्थानीय युवाओं का ब्रेनवाश करने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि इसका एक कारण यह भी है कि फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की ग्रे लिस्ट से बाहर निकलने में पाकिस्तान असफल रहा है।
अधिकारी बताते हैं कि तीन दशक पहले पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने आजादी और आत्मनिर्णय के अधिकार की आड़ में कश्मीर में आतंकवाद शुरू किया था, जो अब धीरे-धीरे दम तोड़ रहा है। लिहाजा फिर से धर्म और कट्टरता का सहारा लेकर वे कश्मीर में आतंकवाद को जिंदा रखना चाहते हैं।
वर्ष 2016 से ही पाकिस्तान ग्रे लिस्ट से बाहर आने का प्रयास कर रहा है। इसके लिए आईएसआई ने कश्मीर में नए नाम से स्थानीय आतंकी संगठन बनाए। इनमें द रजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ), कश्मीर टाइगर्स (केटी), द पीपुल्स एंटी-फासिस्ट फोर्स (पीएएफएफ) और कश्मीर जांबाज फोर्स (केजीएफ) जैसे नाम शामिल हैं। वास्तव में ये सभी संगठन पाकिस्तान से चलने वाले आतंकी संगठन लश्कर- ए-ताइबा, जैश- ए -मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे संगठनों के ही दूसरे नाम हैं। पाकिस्तान इन संगठनों के माध्यम से अपने संगठनों का नाम छुपाना चाहता है।
एक अधिकारी का कहना है कि पाकिस्तान निश्चित रूप से अपनी तोड़फोड़ की कहानी को बदल रहा है। वह युवाओं के ब्रेनवाश करने का प्रयास कर रहा है, जबकि देश के भीतर धर्म को लेकर चलने वाले मामलों का लाभ भी उठा रहा है। बता दें कि हुर्रियत नेता सईद अली शाह गिलानी की मौत के बाद कश्मीर में स्थानीय युवाओं का आतंकवाद के प्रति रुख बहुत कम हुआ है। लिहाजा धर्म के नाम पर युवाओं को इसमें शामिल करने का प्रयास किया जा रहा है। हाल ही में पकड़़े गए आतंकियों और आतंकी मददगारों से पूछताछ में पता चला है कि पाकिस्तान जम्मू कश्मीर में युवाओं को धर्म के नाम पर बांटने की कोशिश कर रहा है।
दवा कारोबारी की हत्या के बाद बदला मौहाल
अधिकारी कहते हैं कि कश्मीर में अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से प्रमुख दवा कारोबारी माखन लाल बिंदू को निशाना बनाने की पिछले साल की घटनाओं का विस्तृत विश्लेषण करने पर पाया गया कि शुरू में आतंकवादी समूहों ने इस घटना की जिम्मेदारी लेते हुए माखन लाल को सरकारी एजेंट बता दिया। परंतु जिस प्रकार उनकी अंतिम यात्रा में लोग उमड़े और घटना के प्रति अपना गुस्सा जताया वह इन चरमपंथियों की आशाओं के विपरीत था। पाकिस्तान की बदली हुई रणनीति स्थानीय लोगों की नाराजगी का ही परिणाम है। सीमा पार के आकाओं को अहसास हो गया कि जनता अब ऐसी घटनाओं को स्वीकार नहीं करेगी।
आतंकियों की संख्या में कमी
कभी कश्मीर घाटी में आतंकवाद के स्थानीय चेहरे रहे हिजबुल मुजाहिदीन जैसे गुटों के पास दहशतगर्दों की संख्या घटी है। इस वर्ष एक जनवरी को हिजबुल के पास सिर्फ 30 सक्रिय आतंकी घाटी में थे। ये आतंकी मुख्य रूप से दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले में सक्रिय थे जबकि उत्तर और मध्य कश्मीर में इनकी उपस्थिति नगण्य थी।