मध्य कश्मीर लोकसभा सीट नेशनल कॉन्फ्रेंस का गढ़ रही है और पार्टी ने 2014 को छोड़कर हर बार यहां से उम्मीदवार उतारकर जीत हासिल की है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला 2014 में पीडीपी उम्मीदवार तारिक हमीद कर्रा से हार गए थे। हालांकि विधानसभा चुनावों में नेकां ने अच्छा प्रदर्शन कर जिले की आठ में से पांच सीटों पर जीत हासिल की थी। बुरहान बानी की मौत के बाद घाटी में 2016 में भड़की हिंसा के दौरान नागरिक मौतों के विरोध में कर्रा ने लोकसभा से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद अब्दुल्ला 2017 के उपचुनाव में संसद में फिर से लौट आए।
उमर अब्दुल्ला और फारूक अब्दुल्ला (फाइल)
- फोटो : एजेंसी
अब्दुल्ला ने 2019 के आम चुनाव में 57 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल करके इस प्रतिष्ठित लोकसभा सीट पर कब्जा किया। पीडीपी उम्मीदवार आगा सैयद मोहसिन 70,000 से अधिक वोट से हार गए। इसके अलावा मजबूत उम्मीदवार कर्रा ने कांग्रेस में शामिल होने के लिए पार्टी छोड़ दी थी। अब्दुल्ला ने 1980 में भी इस सीट से जीत हासिल की थी। उनकी मां बेगम अकबर जहां ने यहां से 1977 का लोकसभा चुनाव जीता था। उमर अब्दुल्ला 1998 से 2009 तक तीन बार यहां से लोकसभा सांसद रहे। 1996 में कांग्रेस ने सीट जीती। क्योंकि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने चुनाव में हिस्सा नहीं लिया। नेकां समर्थित स्वतंत्र उम्मीदवार शमीम अहमद शमीम भी यहां से एक बार 1971 में जीत चुके हैं।
फारूक के चुनाव नहीं लड़ने की अटकलें
अटकलें लगाई जा रही हैं कि नेकां अध्यक्ष फारूक इस बार लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे और पार्टी उनकी जगह उनके बेटे उमर अब्दुल्ला को मैदान में उतार सकती है। उधर, पीडीपी ने भी अभी तक उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है।
परिसीमन प्रक्रिया के बाद दक्षिण कश्मीर के गढ़ शोपियां और पुलवामा जिले को श्रीनगर लोकसभा सीट में शामिल करने से पीडीपी भी मजबूत हुई है क्योंकि पार्टी ने 2014 के विधानसभा चुनावों में इन जिलों में सभी छह क्षेत्रों में जीत हासिल की थी। शोपियां और पुलवामा के अलावा पार्टी की बडगाम जिले की तीन सीटों खान साहिब, चाडूरा और चरारे शरीफ में महत्वपूर्ण उपस्थिति है। पार्टी ने 2014 के विधानसभा चुनाव में चाडूरा और चरारे शरीफ की दो सीटें जीती थीं।
ये भी पढ़ें- लोकसभा चुनाव: परिसीमन से उधमपुर सीट पर बदले समीकरण, भाजपा और आजाद ने उतारे उम्मीदवार, कांग्रेस कर रही मंथन
अपनी बेटी इल्तिजा मुफ्ती के साथ महबूबा मुफ्ती (फाइल)
- फोटो : बासित जरगर
नेकां और पीडीपी में हो सकती है आमने-सामने की टक्कर
नेशनल कॉन्फ्रेंस श्रीनगर और गांदरबल जिलों में मजबूत है जबकि पीडीपी की इन दोनों जिलों में ज्यादा मौजूदगी नहीं बची है। यहां से पार्टी के 2014 में जीते पांच विधायकों में से चार सहित उनके अधिकांश नेता पार्टी छोड़ चुके हैं। यहां नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी के बीच एक तरह से आमने-सामने की टक्कर हो सकती है, क्योंकि भाजपा और कांग्रेस दो मुख्य राष्ट्रीय पार्टियों का यहां प्रभाव कम है। अन्य दो क्षेत्रीय पार्टियां सज्जाद गनी लोन की पीपुल्स कॉन्फ्रेंस और अल्ताफ बुखारी की अपनी पार्टी केवल वोट काटने का काम करती हैं।
डल झील किनारे लगीं शिकारा
- फोटो : बासित जरगर
परिसीमन के बाद इस बार मतदान बढ़ने की उम्मीद
नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी पीपुल्स अलायंस फॉर गुपकार डिक्लेरेशन (पीएजीडी) का हिस्सा हैं। पिछले साल से दोनों पार्टियों के नेताओं के बीच तीखी नोक-झोंक के चलते पीएजीडी की उपयोगिता एक तरह से खत्म हो चुकी है। दोनों के बीच 2020 में हुए डीडीसी और बीडीसी चुनाव तक अच्छी साझेदारी थी। नए परिसीमन के अनुसार श्रीनगर लोकसभा सीट पर करीब 17 लाख मतदाता हैं। आमतौर पर पिछले तीन दशकों में कम मतदान वाली सीट पर इस साल यह आंकड़ा बदल सकता है। 2019 के चुनावों में श्रीनगर लोकसभा सीट पर सिर्फ 13 प्रतिशत मतदान हुआ था।