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कारगिल युद्ध: दुश्मन पर अकेले टूट पड़े थे लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे

Mon, 04 Jul 2016 12:31 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला/जम्मू
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- फोटो : Amar Ujala
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मई में शुरू हुआ कारगिल युद्ध जुलाई में निर्णायक मोड़ ले रहा था। दो और तीन जुलाई की दरमियानी रात बटालिक सब सेक्टर की खलुबार चोटी को हासिल करने की चुनौती बेहद जोखिम भरी थी। कमान अधिकारी कर्नल राय के नेतृत्व वाली टुकड़ी ने दुश्मन की मशीनगन और आरपीजी फायर के बावजूद आगे बढ़ना जारी रखा। 
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तीन जुलाई को खलुबार चोटी की ओर बढ़ती सैन्य कंपनी के लिए मुश्किलें खड़ी करते दुश्मन से निपटने का जिम्मा लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे को मिला। उनकी पलटून अपने लक्षित स्थान पर पहुंची ही थी कि ऊंचाई वाले सटे इलाकों से भीषण फायरिंग शुरू हो गई। लेफ्टिनेंट पांडे ने पलटून को तुरंत सुरक्षित स्थान की ओट दिलाई। 

निडरता के साथ उन्होंने दुश्मन की पहली पोजीशन पर धावा बोलकर दो दुश्मन ढेर कर दिए। खुद जाकर उन्होंने दूसरी पोजीशन पर भी हमला बोलकर दो और दुश्मन मार गिराए। माथे पर गोलियों की बौछार से घायल होने के बावजूद तीसरी पोजीशन क्लियर करने के बाद उन्होंने दुश्मन की चौथी पोजीशन को ग्रेनेड से उड़ा दिया। 
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परमवीर चक्र का सपना पूरा किया 

- फोटो : mensxp.com
दुश्मन पर अकेले ही भारी पड़े लेफ्टिनेंट पांडे ने अपनी कंपनी को आगे बढ़ने के लिए आधार दिला दिया। नतीजतन खलुबार चोटी फतह कर ली गई। लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे को मरणोपरांत परमवीर चक्र का सम्मान मिला। कर्नल ललित राय और लांस नायक ज्ञानेंद्र कुमार राय को वीर चक्र दिया गया।

फ्लैशबैक : उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के राधु गांव के मनोज कुमार पांडे की पहली ही पोस्टिंग कश्मीर घाटी में हुई। एनडीए परीक्षा के साक्षात्कार में पांडे ने सेना में आने की वजह पूछने पर कहा था कि वह परमवीर चक्र जीतना चाहते हैं। खलुबार मोर्चे पर प्राण देकर उन्होंने अपना सपना साकार किया।

पूरे युद्ध में कठुआ के 6 जांबाज पड़े थे दुश्मन पर भारी
रियासत के प्रवेश जिला कठुआ के छह रणबांकुरे पूरे कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हुए। पूंडा बटाड़ी से 13 जैकलाई के हवलदार जगन्ननाथ, मारता नगरोटा से 12 जैकलाई के हवलदार राजेंद्र सिंह, महेशाचक से 12 जैकलाई के नायक पवन कुमार, सारथियां से 8 जैकलाई के सिपाही लखविंदर सिंह, माड़ापट्टी बसोहली से 153 मीडियम रेजिमेंट के हवलदार सरदूल सिंह और तारानगर से 12 जैकलाई के हवलदार अब्दुल करीम की शहादत को स्थानीय इलाकों को आज भी याद किया जाता है।
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