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आतंक का कलंक धोने की बेचैनी: सड़क, स्कूल, अस्पताल, बेरोजगारी और किसानों के मामले हमारे भी मुद्दे, लेकिन...

Tue, 17 Sep 2024 11:02 AM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू

सार

आतंकवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित शोपियां और पांपोर की सियासी आबोहवा बदल रही है। अब यहां आतंकी परिवारों के प्रति किसी की हमदर्दी नजर नहीं आती। लोग विकास और बदलाव का हिस्सा बनने के लिए छटपटा रहे हैं। सड़क, बिजली, पानी, पढ़ाई, दवाई और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतों पर बात करना चाहते हैं...खुलेआम स्वीकार करते हैं कि उन्हें खूब गुमराह किया गया, पर अब नहीं होंगे...आतंकवाद की चर्चा पर ही नाराज हो जाते हैं। लोकसभा की तरह विधानसभा चुनाव में भी समझदारी और पूरी ताकत से वोट करने को तैयार हैं। 18 सितंबर को होने वाले मतदान से पहले इन अतिसंवेदनशील क्षेत्रों का हाल बता रहे हैं महेंद्र तिवारी...
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Jammu Election - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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कभी मिनी पाकिस्तान कहे जाने वाले शोपियां में चुनावी सरगर्मी है। जगह-जगह नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी के झंडे लहरा रहे हैं। झंडे लगी गाड़ियां चक्कर काट रही हैं। नेशनल हाइवे छोड़कर जैसे ही शोपियां की ओर बढ़ते हैं, सेब के बगीचे और प्राकृतिक सुंदरता मन मोहने लगती हैं। जगह-जगह सेना के चेकपोस्ट और मुस्तैद जवानों से अंदाजा भी लग जाता है कि शोपियां में तनिक भी सुस्ती, ढिलाई की अभी गुंजाइश नहीं है।
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शोपियां के पास सेब के एक बाग में किसान व सामाजिक कार्यकर्ता मो. याकूब गत्तो मिले। चुनावी माहौल पूछा तो गंभीर हो गए। कहते हैं, कश्मीरी अपनी शराफत के लिए जाने जाते रहे हैं। लेकिन...आतंकी मारकाट ने ऐसी बदनामी दी, जिससे पिंड छुड़ाना मुश्किल हो गया है। कहते हैं, हमारे लोगों ने भी आतंकवाद का दंश कम नहीं झेला है, तमाम सगे-संबंधियों को मुसलमानों ने भी खोया है। 

लोग इस जलालत से आजिज आ गए हैं। इससे छुटकारा चाहते हैं। कश्मीरियों के लिए भी बेरोजगारी, नशाखोरी, खेती की चुनौतियां, सड़कों की बदहाली और अच्छे स्कूल व अस्पताल की जरूरतों जैसे कई मुद्दे हैं, लेकिन इन पर चर्चा नहीं होती। केवल आतंकवाद ही यहां मुद्दा रहता है। 
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वह कहते हैं, लोकसभा चुनाव में जमकर वोटिंग इसी तोहमत से पिंड छुड़ाने का प्रयास था। इस बार लोकसभा चुनाव से भी ज्यादा वोटिंग हो, तो चौंकिएगा नहीं। अनुच्छेद 370 खत्म करना 2019 से पहले भाजपा के लिए मुद्दा था, अब एंटी भाजपा कश्मीरी दलों के लिए इसकी बहाली मुद्दा है। लेकिन, चुनाव में इसका ज्यादा फर्क पड़ने वाला नहीं है।

सेब का कटोरा...ईरानी सेब से बढ़ी चुनौती
शोपियां की पहचान सेब के कटोरे की है। आय का मुख्य जरिया भी सेब है। इसके बावजूद इसकी चर्चा ज्यादा नहीं है। सामाजिक कार्यकर्ता गत्तो कहते हैं कि 90% परिवार इसी की खेती से जुड़े हैं। सीजन में 3 लाख मीट्रिक टन सेब का उत्पादन और 1000-1200 करोड़ रुपये का कारोबार होता है। पिछले दिनों ओले गिरने से 25 गांवों के सेब बर्बाद हो गए। एक कनाल खेत से तीन लाख का सेब निकलता है। लेकिन, मुआवजा सिर्फ 2000 रुपये प्रति कनाल मिलता है।

गत्तो कहते हैं, पीएम फसल बीमा योजना में अगर सेब भी हो, तो नुकसान की भरपाई हो जाए। वह कहते हैं कि मुश्किल अफगानिस्तान बॉर्डर से बिना कस्टम ड्यूटी ईरानी सेब के आयात से भी बढ़ी है। बिना ड्यूटी सेब आयात पर रोक लगनी चाहिए।

हालात सुधरे, बदलाव की चल रही बयार
2019 से पहले शोपियां आतंकियों की नर्सरी व पत्थरबाजी के लिए बदनाम था। अब इसमें कमी आई है। शोपियां से करीब दो किमी पहले मिलिट्री चेकपोस्ट के पास मिले मो. रफीक कहते हैं कि हालात सुधरे हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव के बीच भाजपा के सरपंच एजाज शेख की हत्या से लोग अभी तक डरे हैं। लोगों को लगता है कि न जाने कहां, कब, क्या हो जाए? अब लोग बदलाव चाहते हैं। पॉलिटिकल सेटअप बहुत जरूरी है।

 

रफीक कहते हैं गड़बड़ियां नए लोग कर रहे हैं, पुलिस पुराने लोगों के रिकार्ड निकालकर परेशान कर रही है। लोग कहां जाएं? चुना हुआ प्रतिनिधि होगा, तो लोग उसके पास जाएंगे। आगे बढ़ने पर रफीक की सुरक्षा वाली चिंता भी समझ में आई। चेकपोस्ट पर जवान ने हिदायत दी कि गाड़ी में शीशा बंद रखना।

 

आतंकी वारदातों के खिलाफ भावनाएं भुनाने की होड़
शोपियां में नेशनल कांफ्रेंस ने शेख मो. रफी को उतारा है। रफी के विधायक पिता शेख मो. मंसूर को आतंकी वारदात में इन्हें जान गंवानी पड़ी थी।
 

पीडीपी ने यावर शफी बंडे को प्रत्याशी बनाया है, िजनके विधायक रह चुके बाबा व चाचा आतंकी वारदात में मारे जा चुके हैं। राजा वहीद इंजीनियर रशीद की पार्टी अवामी इत्तेहाद पार्टी से मैदान में हैं।
 
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2014 में भाजपा को कश्मीर क्षेत्र की सीटों पर सर्वाधिक वोट शोपियां से ही मिला था। तब प्रत्याशी रहे जावेद अहमद कादरी फिर मैदान में हैं।

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