गवर्नमेंट गर्ल्स सिटी मिडिल स्कूल के आंगन में लगी कक्षा में बैठकर पढ़ाई करते विद्यार्थी: संवा
- पत्थरों से बनी दो मंजिला इमारत में चल रहा सरकारी गर्ल्स सिटी मिडिल स्कूल उधमपुर
कैसी है पाठशाला का ... लोगो लगाएं
संवाद न्यूज एजेंसी
उधमपुर। कक्षाओं के संचालन के लिए पत्थरों से निर्मित 70 साल पुरानी दो मंजिला खस्ताहाल इमारत। गैर शिक्षण कार्यों के लिए आधुनिक चकाचक कमरे। विद्यार्थियों की कक्षाएं खुले आंगन में, यह दृश्य है शहर के बीचोबीच वार्ड 13 में मौजूद सरकारी गर्ल्स सिटी मिडिल स्कूल उधमपुर का।
पत्थर से निर्मित इस स्कूल की दो मंजिला इमारत में पांच क्लासरूम हैं। खिड़कियां क्षतिग्रस्त हैं और दीवारों पर भी दरारें हैं जिन्हें लीपापोती करके काम चलाऊ बनाया गया है। यहां डर का माहौल इस कदर हावी है कि अधिकतर समय कक्षाएं आंगन में लगती हैं। पुरानी इमारत में बच्चों से लेकर शिक्षक तक कक्षाओं में जाने से कतराते हैं।
स्कूल की इमारत काफी कमजोर हो चुकी है। छत से लेकर इसकी दीवारों तक में दरारें नजर आने लगी हैं। बाहर आंगन में भी एक टिन का शेड और एक कमरे का एक ढांचा बना है और यह भी काफी पुराना होने के कारण अब गिरने की कगार पर है। बहरहाल स्कूल में आठ कक्षाओं के संचालन के लिए स्कूल में पांच क्लासरूम हैं। इस कारण कुछ कक्षाएं बाहर आंगन में लगाई जाती हैं।
स्कूल में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की कुल संख्या 80 है और इन्हें पढ़ाने के लिए छह शिक्षक तैनात हैं। कंप्यूटर शिक्षा के लिए पांच कंप्यूटर मौजूद हैं लेकिन आउटडेटेड हो चुके यह कंप्यूटर बीते कई सालों से खराब पड़े हैं। साल 2023 में स्कूल की मरम्मत के लिए आठ लाख रुपये खर्च किए गए लेकिन इस फंड का अधिकतर इस्तेमाल कार्यालय के टाइल वर्क और इसे चकाचक बनाने में खर्च हुआ।
खिड़कियों से बारिश का पानी अंदर आता है, दीवारों पर सीलन हो जाती है
सीमा देवी, अंजलि देवी, अक्षय, सिमरन व अन्य विद्यार्थियों का कहना था कि स्कूल के पीछे लगे एक बरगद के पेड़ की जड़ों से इमारत की दीवारों को काफी नुकसान हुआ है। एक कमरे की दीवारों में दरारें आ चुकी थीं। इससे इमारत के गिरने का डर पैदा हो गया था। बाद में वृक्ष को तो कटवा दिया गया लेकिन यह काफी पुरानी और पत्थर की इमारत होने के कारण हमेशा गिरने का डर बना रहता है। बरसात के दिनों में खिड़कियों से भी पानी अंदर आ जाता है और दीवारों पर भी सीलन हो जाती है। इसके स्थान पर नई इमारत बनानी चाहिए ताकि बिना किसी परेशानी के पढ़ाई जारी रख सकें।
साल 2023 में लगभग आठ लाख की लागत से मरम्मत का काम किया गया है लेकिन यह नाकाफी है। स्कूल की इमारत काफी पुरानी और पूरी तरह से पत्थर से बनी हुई है। मरम्मत से काम तो चलाया जा रहा है लेकिन पुराने ढांचों को ध्वस्त कर नई मजबूत इमारत बनाना ही बेहतर है। यह स्कूल शहर के बीचोबीच मौजूद है। यहां विद्यार्थियों की संख्या भी काफी अधिक रहती है। कमरों की कमी के कारण परेशानी पेश आती है। फिलहाल मरम्मत के लिए प्रस्ताव बनाकर भेजा गया है।
-प्राध्यापिका, खीमा बडयाल
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समय-समय पर मरम्मत का काम किया जाता है लेकिन इमारत पुरानी होने के कारण स्कूल के लिए नई इमारत बनाने के लिए प्रयास किया जा रहा है।
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कल्पना जसरोटिया, डिप्टी सीईओ