जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी कर्मचारी को महज इसलिए जबरन सेवानिवृत्त नहीं किया जा सकता कि उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज है।इस तरह का कोई भी निर्णय लेने से पूर्व सरकार को उसके समूचे कार्यकाल और समय-समय पर उसके कामकाज की समीक्षा पर आधारित रिपोर्ट देखनी होती है। इसी टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने एकल पीठ के फैसले को बरकरार रखते हुए सरकार की अपील को खारिज कर दिया। वन निगम के मंडल प्रबंधक को सभी लाभ देते हुए बहाल करने को कहा गया है।
यह मामला राज्य वन निगम में मंडल प्रबंधक रियाज अहमद मसूदी से जुड़ा है, जिन्हें सरकार ने वर्ष 2015 में जबरन सेवानिवृत्त कर दिया था। मसूदी पर दो एफआईआर दर्ज थीं, जिसे सरकार के आदेश में सबसे बड़ा आधार बताया गया। न्यायाधीश अली मोहम्मद मागरे और न्यायाधीश पुनीत गुप्ता की खंडपीठ ने कहा कि एकल पीठ ने सरकार के आदेश को खारिज कर दिया था। खंडपीठ भी इस फैसले को सही मानती है।
सरकार सिर्फ अपने फैसले पर संतुष्टि जाहिर कर किसी को सेवामुक्त नहीं कर सकती। 48 वर्ष की आयु से पहले किसी को भी जबरन सेवानिवृत्त करने से पूर्व सरकार को कर्मचारी का समूचा सेवाकाल देखना होगा। खंडपीठ ने कहा कि एकल पीठ ने 23 मार्च 2018 को जो फैसला दिया था, खंडपीठ उसे बरकरार रखते हुए आदेश देती है कि इस कर्मचारी की सेवाएं बहाल करते हुए तमाम लाभ दिए जाएं।
एपीआर, सर्विस बुक, शिकायतें भी देखनी होंगी
कोर्ट ने कहा कि नागरिक सेवा नियम (सीएसआर) के अनुच्छेद 226 (2) में स्पष्ट बताया गया है कि सरकारी कर्मचारी की सेवा पर फैसला लेने से पूर्व उसका पूरा सेवाकाल देखा जाना जरूरी है। कर्मचारी से संबंधित एपीआर, सर्विस बुक, समय-समय पर मिली शिकायतों का ब्योरा देखना भी आवश्यक है। इसके बावजूद यदि सरकार महज दो एफआईआर दर्ज होने को आधार बनाकर जबरन सेवानिवृत्ति का फैसला लेती है तो यह नियमों के विपरीत है।