श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने एक वैवाहिक विवाद में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो जाने के बाद आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि समझौते के बाद ऐसे मामलों में आपराधिक कार्यवाही जारी रहना सुलह के परिणाम को नष्ट करने के बराबर है।
न्यायमूर्ति संजय धर की पीठ ने नरिंदर सिंह और अन्य बनाम पंजाब सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि वैवाहिक मामलों में दोनों पार्टियों के बीच समझौता हो जाने के बाद आपराधिक कार्यवाही को रद्द करना उच्च न्यायालय की शक्तियों में निहित था।
जस्टिस धर ने कहा कि पारिवारिक विवाद अथवा दहेज का मामला मूल रूप से बेहद निजी या व्यक्तिगत प्रकृति का है। जब दोनों पक्ष एकबार समझौते में शामिल हो जाते हैं तो इसका मतलब दोनों पार्टियों ने अपने पूरे विवाद को हल कर लिया है। दोनों पक्षों में समझौते के बाद आरोपी की दोषसिद्धि की संभावना बहुत कम रह जाती है। ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने पाया है कि यह दोनों पक्षों द्वारा समझौते के बावजूद आपराधिक कार्यवाही जारी रखने की अनुमति उनके साथ अन्याय ही होगा।
अदालत ने तथ्यों का हवाला देते हुए कहा कि यह स्पष्ट है कि वैवाहिक विवाद के पक्षकारों यानी पति और पत्नी ने समझौता किया है और दोनों पक्षों द्वारा एक दूसरे के खिलाफ दर्ज मामले और काउंटर मामले वापस ले लिए गए हैं। केवल इसलिए कि धारा 354 आरपीसी के तहत अपराध,जिसके लिए पत्नी द्वारा की गई शिकायत के आधार पर पति मुकदमे का सामना कर रहा है, क्षमायोग्य अपराध है। अगर आपराधिक कार्यवाही को समाप्त नहीं किया जाता है, तो यह पति के साथ घोर अन्याय होगा और पार्टियों के बीच हुए समझौते की भावना को नष्ट करने के समान होगा। अदालत ने कहा कि इन परिस्थितियों में पुरुष (पति) के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग के अलावा और कुछ नहीं होगा। इसके बाद अदालत ने दहेज के मामले में पुलवामा पुलिस स्टेशन में दर्ज धारा 341, 506, 354 आरपीसी के तहत प्राथमिकी रद्द कर दी।