राजोरी। जिले को विद्रोहियों और पाकिस्तानी सेना से आजाद कराने के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले सेना के जवानों की वीरता और पराक्रम को याद करने के लिए हर साल 13 अप्रैल को राजोरी दिवस मनाया जाता है। याद रहे कि 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह द्वारा विलय के तुरंत बाद कश्मीर को संकट से बचाने के लिए जम्मू-कश्मीर में सेना उतरी थी।
पाकिस्तानी हमलावरों ने राजपुर से राजोेरी की ओर बढ़ने वाले विद्रोहियों और कबायलियों ने 7 नवंबर 1947 को राजोरी पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद छह माह तक राजोेरी में बड़े पैमाने पर कत्लेआम हुआ। महिलाएं जान बचाने के लिए कुएं में कूद गईं थीं, या जहर खाकर उन्होंने मौत को गले लगा लिया था। यह सिलसिला 12 अप्रैल 1948 की रात तक चलता रहा और 13 अप्रैल की सुबह एक नया सवेरा आया। जब सेना ने राजोेरी को कबायलियों से मुक्त कराया।
राजोरी पर पाकिस्तान हमले को स्वयं अपनी आंखों से देखने वाले वरिष्ठ भजपा नेता कुलदीप राज गुप्ता ने बताया कि राजोेरी शहर में प्रवेश करते ही पाकिस्तानी कबायलियों ने लूटपाट शुरू कर दी थी। यह नरसंहार 7 नवंबर 1947 से 12 अप्रैल 1948 तक जारी रहा। हजारों लोग जान बचाने के लिए पहाड़ों और जंगलों में छिप गए थे। 11 नवंबर 1947 को आजादी के बाद देश में दिवाली का पहला त्योहार मनाया जा रहा था, और राजोेरी पाकिस्तानी कबायलियों के उत्पीड़न में जल रहा था। गुप्ता ने बताया कि एक दिन में तीन हजार से ज्यादा हत्याएं कर दी गई थीं। उस वक्त 10 साल के कुलदीप राज गुप्ता उस भयानक मंजर को याद कर आज भी कांप उठते हैं। उनका कहना है कि आज भी मुझे बच्चों के रोने की आवाज सुनाई देती हैं। इस लड़ाई में उनके पिता सहित परिवार के कई सदस्य मारे गए।
एक अन्य वरिष्ठ नागरिक कृष्ण लाल गुप्ता का कहना है कि आदिवासियों ने राजोेरी पर कहर बरपाया। जो भी मिला उसे मार डाला। उनका कहना है कि आज भी जब उन्हें वह मंजर याद आता है तो उनकी आंखों से आंसू बहने लगते हैं। महिलाओं को कुएं में कूदकर मरना पड़ा था, या परिवार के सदस्यों ने बहू को जहर दे दिया था। आज उस कुएं के स्थान पर यज्ञ का स्थान बना दिया गया है।
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राणा की वीरता के आगे हर साजिश नाकाम
जब सेना ने इसे राजोेरी से मुक्त कराने का अभियान शुरू किया तो पाकिस्तानी कबायलियों की टांगें ज्यादा देर तक नहीं टिक सकीं। नौशेरा से पीछे हटते हुए पाकिस्तानी सेना ने साजिश रची थी, लेकिन डोगरा रेजीमेंट के सेकेंड लेफ्टिनेंट राम रागोबा राणा की वीरता और सूझबूझ के आगे हर साजिश नाकाम रही। उन्होंने 15 दिसंबर 1947 को सेना के इंजीनियरिंग कोर में एक अधिकारी के रूप में कमीशन प्राप्त किया। 8 अप्रैल 1948 को डोगरा रेजिमेंट के सैनिकों और अधिकारियों ने पाकिस्तानी सेना और कबायलियों को राजोेरी से खदेड़ने के लिए नौशेरा से राजोेरी तक मार्च किया।
पाकिस्तानी सेना ने रास्ते में बारूदी सुरंगें बिछा दी थीं। पेड़ों को काटकर सड़क पर फेंक दिया था। घायल होने के बावजूद राणा ने बारूदी सुरंगों को साफ करना और सेना के लिए रास्ता बनाना जारी रखा। उन्हीं की बदौलत सेना राजोेरी में दाखिल हुई थी। पाकिस्तानी कबायलियों को खदेड़ राजोरी को 13 अप्रैल 1948 को आजादी दिलाई। इसके लिए उन्हें वीरता के लिए परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनके नाम से राजोरी के गुज्जर मंडी चौक में हवाई पट्टी बनाई गई है।