पुंछ में मोहम्मद शबीर के घर में मिठाईयां बांटते परिवार के सदस्य।
- फोटो : POONCH
पुंछ। सुरनकोट तहसील के ब्लॉक लसाना के दूरदराज एवं पहाड़ी पर स्थित गांव बच्चेयांवाली में और गांव निवासी गुलाम मोहम्मद के घर में मंगलवार को जश्न का माहौल रहा। क्योंकि उनका सबसे छोटा बेटा आईएएस बन गया। उसने यूपीएससी की परीक्षा में 419 वां स्थान प्राप्त किया है। उसकी इस सफलता से घर में बधाइयां देने वालों का तांता लगा है।
बधाई देने वालों में महिलाएं, पुरुष और युवाओं की बड़ी संख्या है। मिठाईयां बांटी जा रही हैं और दावतों का दौर चल रहा है, जिसमें गांव के लोग एवं रिश्तेदार शामिल हो रहे हैं। घर में ईद जैसा वातावरण बना हुआ है। संवाद न्यूज एजेंसी ने आएएस मोहम्मद शब्बीर के गांव एवं घर का मंगलवार को दौरा किया, तो वहां के हालात जहां एक तरफ किसी उत्सव जैसे थे। वहीं आज भी गांव बच्चेयांवाली का पक्की सड़क, पानी एवं बिजली की उचित आपूर्ति से वंचित होना हैरान कर देने वाला दिखा। इतनी सब कमियों के बावजूद गांव के एक युवक के यूपीएससी परीक्षा पहले प्रयास में पास करना न सिर्फ गांव, तहसील, जिले बल्कि पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणास्रोत के रूप में उभरा है।
जब संवाद न्यूज एजेंसी ने मोहम्मद शब्बीर के पिता गुलाम मोहम्मद से बात की, तो मारे खुशी से वह फूले नहीं समा रहे थे। सबसे छोटे बेटे की सफलता पर उनका कहना था कि हमने बड़े संघर्ष के दौर से गुजर कर यह खुशी का दिन देखा है। वर्ष 2015 में जब शब्बीर की मां का निधन हो गया, तो मुझे लगा शायद अब यह आगे पढ़ नहीं पाएगा। मां से जुदाई के गम के साथ अपने लक्ष्य आईएएस बनने की कड़ी मेहनत जारी रखी।
शब्बीर के बड़े भाई मोहम्मद रफीक, मोहम्मद आशिक और बड़ी बहन रजिया बी घर आने वालों की आवभगत में लगे थे, तो दूसरी तरफ भाई की सफलता पर खुशी प्रकट करते हुए वो नहीं थकते। शब्बीर बचपन से होनहार था। वह हर कक्षा में प्रथम आता। उधर अपने भतीजे के लिए सऊदी अरब में वर्षों तक मजदूरी करने वाले मोहम्मद रशीद के चाचा अता मोहम्मद का कहना है कि हम लोग बहुत गरीब हैं। हम आज तक पक्का घर नहीं बना पाए। घर बनाना तो दूर, बारिश में टपकती कच्ची मिटटी की छत की मरमत तक नहीं करा पाए। सभी बच्चे अच्छे पढ़ लिख गए हैं। शब्बीर आईएएस बन गया है। अत्ता मोहम्मद ने कहा कि हमारा गांव आज भी सुविधाओं से वंचित है। 2002 से पहले यह आतंकवाद का गढ़ था, जिसके लिए हमें बच्चों को घर से निकाल कर पुंछ भेजना पड़ा।