बंदरों के बड़े आकार वाली प्रजातियों को ग्रेट एप्स कहा जाता है। इनमें गोरिल्ला, चिंपाजी, बोनोबो और ओरंगुटान शामिल हैं। इनके महत्वपूर्ण आवास कड़े पर्यावरणीय नियमों के अधीन हैं, इसके बावजूद खनन गतिविधियों में लगातार वृद्धि होती जा रही है।
खनिजों की बढ़ती मांग से अफ्रीका की खनन गतिविधियों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। इसकी वजह से जंगलों का अंधाधुंध विनाश हो रहा है। इस कारण करीब पौने दो लाख गोरिल्ला और चिंपांजियों (ग्रेट एप्स) की आबादी पर खतरा मंडरा रहा है। जर्मन सेंटर फॉर इंटीग्रेटिव बायोडायवर्सिटी रिसर्च और मार्टिन लूथर यूनिवर्सिटी हाले-विटनबर्ग के शोधकर्ताओं ने संरक्षण संगठन रे-वाइल्ड के सहयोग से किए अध्ययन में यह खुलासा किया है। इसके मुताबिक, अब इसे नजरअंदाज करना इनके अस्तित्व पर दांव लगाने जैसा होगा।
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17 अफ्रीकी देशों में खनन क्षेत्रों के आंकड़ों के आधार पर किया गया अध्ययन पहले ही लाल सूची में...
ये वानर पहले से ही आईयूसीएन की लाल सूची में हैं। अपने अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 17 अफ्रीकी देशों में खनन क्षेत्रों के आंकड़ों का इस्तेमाल किया।
ऊर्जा की बढ़ती मांग से बढ़ रहा खनन का दबाव...
अध्ययन में शोधकर्ताओं ने महत्वपूर्ण खनिजों की बढ़ती मांग से उभरते खतरों की भी पहचान की है। इन खनिजों की मांग स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की ओर दुनिया की बढ़ती दिलचस्पी के साथ बढ़ती जा रही है। इन खनिजों की बढ़ती मांग से अफ्रीका में खनन गतिविधियों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। इसकी वजह से जंगलों का अंधाधुंध विनाश किया जा रहा है। इसलिए इन ग्रेट एप्स की आबादी पर खतरा बहुत ज्यादा बढ़ गया है।
82 फीसदी आबादी सक्रिय खनन स्थलों के पास
बंदरों के बड़े आकार वाली प्रजातियों को ग्रेट एप्स कहा जाता है। इनमें गोरिल्ला, चिंपाजी, बोनोबो और ओरंगुटान शामिल हैं। अध्ययन के अनुसार, इनके महत्वपूर्ण आवास कड़े पर्यावरणीय नियमों के अधीन हैं, इसके बावजूद आशंका जताई गई है कि जिस तरह से खनन गतिविधियों में लगातार वृद्धि होती जा रही है उसके कारण पश्चिम अफ्रीका में ये वानर सबसे गंभीर रूप से प्रभावित हो सकते हैं।
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ऐसा इसलिए, क्योंकि इनकी 82 फीसदी आबादी सक्रिय या नियोजित खनन स्थलों के पास रहती है। इनके आवास के आसपास बढ़ती मानवीय दखलअंदाजी के कारण अवैध शिकार की कुछ घटनाएं भी सामने आई हैं।