पहला अविश्वास प्रस्ताव नेहरू काल में आया था
पहला अविश्वास प्रस्ताव भारतीय संसद के इतिहास में पंडित जाहर लाल नेहरू के कार्यकाल में अगस्त 1963 में जे बी कृपलानी ने रखा था। तब इस प्रस्ताव के पक्ष में केवल 62 वोट पड़े थे और विरोध में 347 वोट पड़े थे। और सरकार चलती रही थी।
अभी तक कितनी बार आया प्रस्ताव
देश अब 71 साल का हो चुका है। और संसद में 26 से ज्यादा बार अविश्वास प्रस्ताव रखे जा चुके हैं। लेकिन अगर इतिहास पर नजर डालें तो सिर्फ1978 में मोरारजी देसाई की सरकार गिरा दी गई थी। मोरारजी देसाई के शासन काल में उनकी सरकार के खिलाफ दो बार अविश्वास प्रस्ताव रखे गए थे। पहले प्रस्ताव के दौरान घटक दलों में आपसी मतभेद होने की वजह से प्रस्ताव पारित नहीं हो सका लेकिन दूसरी बार जैसे ही देसाई को हार का अंदाजा हुआ उन्होंने मतविभाजन से पहले ही इस्तीफा दे दिया था।
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गांधी के खिलाफ आए सबसे ज्यादा अविश्वास प्रस्ताव
देश के इतिहास में सबसे ज्यादा अविश्वास प्रस्ताव इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान आए। उनके शासन काल में 15 से अधिक बार प्रस्ताव पेश किया गया। यही नहीं लाल बहादुर शास्त्री और नरसिंह राव की सरकारों ने भी तीन-तीन बार अविश्वास प्रस्ताव का सामना किया। 1993 में नरसिंह राव बहुत कम अंतर से अपनी सरकार को बचाने में कामयाब हुए थे।
किसने सबसे ज्यादा बार पेश किया प्रस्ताव
यह भी एक रिकॉर्ड है। सबसे ज्यादा अविश्वास प्रस्ताव पेश करने का रिकॉर्ड माकपा सांसद ज्योतिर्मय बसु के नाम दर्ज है। उन्होंने अपने चारों प्रस्ताव इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ रखे थे।
वाजपेयी का रिकॉर्ड थोड़ा अलग है
स्वयं प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने विपक्ष में रहते हुए दो बार अविश्वास प्रस्ताव पेश किए हैं। पहला प्रस्ताव इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ था और दूसरा नरसिंह राव सरकार के विरुद्ध। प्रधानमंत्री बनने के बाद बाजपेयी ने दो बार विश्वास मत हासिल करने का प्रयास किया और दोनो बार वे असफल रहे थे। 1996 में तो उन्होंने मतविभाजन से पहले ही इस्तीफा दे दिया और 1998 में वे एक वोट से हार गए थे।
अस्सी के दशक में अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष के प्रतीकात्मक विरोध का एक साधन माने जाते थे, जिनका उद्देश्य सरकार की जवाबदेही तय करना होता था। लेकिन गठबंधन सरकारों के दौर में विपक्ष के इस हथियार का महत्व बढ़ गया है।
अविश्वास प्रस्ताव पर अब तक चार बार ध्वनि मत से फैसला हुआ है जबकि 20 बार इन पर मतविभाजन कराया जा चुका है।
विश्वास प्रस्ताव
जहां तक विश्वास प्रस्ताव का सवाल है, अब तक प्रधानमंत्रियों को दस बार ये मत लेने को कहा गया है। ऐसे मतों में पांच सफल रहे थे और पांच असफल रहे। नब्बे के दशक में विश्वनाथ प्रताव सिंह, एच डी देवेगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल और अटल बिहारी की सरकारें विश्वास प्रस्ताव हार चुकी हैं।
1979 में ऐसे ही एक प्रस्ताव के पक्ष में जरूरी समर्थन न जुटा पाने के कारण तत्काली प्रधानमंत्री चरण सिंह ने इस्तीफा दे दिया था।