पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने राज्य के चौथे वित्त आयोग से कहा है कि पांच साल का कार्यकाल खत्म होने के बाद भी बने रहना संविधान का उल्लंघन है। इसके सदस्यों को अतिरिक्त अवधि का वेतन लौटाना होगा। आयोग द्वारा किए गए सारे खर्चों को भी वसूलने की जरूरत है, क्योंकि जनता के धन को इस तरह नहीं बर्बाद नहीं किया जा सकता।
राज्यपाल धनखड़ ने रविवार को कहा कि आयोग के सदस्य कार्यकाल खत्म होने के बाद की अवधि का वेतन लौटाने के लिए बाध्य हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि आयोग ने 2014 के बाद से राज्यपाल को कोई रिपोर्ट नहीं सौंपी है, इसका मतलब है कि संवैधानिक मशीनरी ठप हो गई है।
राज्यपाल ने ट्वीट कर कहा, 'वित्त आयोग पांच साल के लिए था, लेकिन ममता सरकार में चौथा वित्त आयोग इसके बाद भी बना रहा, यह संविधान का उल्लंघन है। इसके चेयरमैन व सदस्य वेतन व भत्ते राज्य को लौटाने के जिम्मेदार हैं। आयोग द्वारा किए गए सारे खर्च भी उनसे वसूले जाने चाहिए। जनता के पैसों को इस तरह गंवाया नहीं जा सकता।'
फरवरी 2016 में सीएम को रिपोर्ट सौंपने के बाद नहीं लिया वेतन
उधर, चौथे वित्त आयोग के अध्यक्ष अभिरूप सरकार ने पीटीआई से कहा कि आयोग के सदस्यों ने फरवरी 2016 में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अपनी रिपोर्ट सौंपने के बाद से कोई फीस नहीं ली है। चौथे वित्त आयोग का गठन पश्चिम बंगाल सरकार ने अप्रैल 2013 में किया था। राज्यपाल के आरोप पर अभिरूप सरकार ने कहा कि आयोग के तीन अंशकालिक सदस्य थे। वे बैठकों के लिए फीस लेते थे। हमने फरवरी 2016 में रिपोर्ट सौंपने के बाद कोई पैसा नहीं लिया है।
राज्यपाल का कहना है कि संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार वित्त आयोग को अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपना चाहिए। इसके बाद इसे विधानसभा के पटल पर रखा जाता है। राज्य में संवैधानिक तंत्र ठप हो गया है। 2014 के बाद से राज्यपाल को एक भी सिफारिश नहीं भेजी गई है।