- भारतीय दंड संहिता (IPC) में कहीं भी एनकाउंटर या न्यायिक हिरासत में मौत को लेकर उल्लेख नहीं किया गया है।
- मगर आईपीसी की 96 से 106 धाराएं पुलिसकर्मियों के लिए एक बड़ा हथियार साबित होती हैं। इसके जरिए वे एनकाउंटर को आत्मरक्षा में उठाया गया कदम दिखा देते हैं।
- ये धाराएं आत्मरक्षा में कदम उठाने का अधिकार देती हैं। यह धारा न सिर्फ पुलिस बल्कि आम लोगों पर भी लागू होती हैं।
- विकास दुबे से लेकर अधिकतर एनकाउंटर में पुलिस का बयान यही होता है कि उसने आत्मरक्षा में यह कदम उठाया।
स्पष्ट दिशानिर्देशों का अभाव
- साल 2014 में हालांकि तत्कालीन चीफ जस्टिस आर एम लोढ़ा ने मुंबई में 1995 से 1997 के बीच हुए 99 एनकाउंटर पर दिशानिर्देश बनाने के आदेश दिए थे।
- मुंबई में दो साल में हुए 99 एनकाउंटर में 135 लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद अदालत ने एनकाउंटर और उसकी जांच के लिए 16 प्वाइंट के दिशानिर्देश जारी किए थे।
- इसमें पूरी प्रक्रिया को लिखित या इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म में रिकॉर्ड करने की बात कही गई थी।
- मगर अक्सर जांच करने वाले भी सिस्टम का ही हिस्सा होते हैं। इस वजह से इन मामलों में सही तरह से निष्पक्ष जांच नहीं हो पाती है।
मार्च 1997 में तत्कालीन मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एम एन वेंकटचलिया ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर कहा था कि फर्जी एनकाउंटर को लेकर उन्हें शिकायतें मिल रही हैं। चीफ जस्टिस रहे वेंकटचलिया ने कहा था कि हमारा कानून किसी भी पुलिसकर्मी को किसी की भी जान लेने की इजाजत नहीं देता है। इसे गैर इरादतन हत्या ही माना जाना चाहिए। सिर्फ किसी की जिंदगी बचाने की कोशिश में ही पुलिस को किसी की जान लेने का अधिकार है। इसके लिए ये दिशानिर्देश बनाए गए...
- अगर थाना प्रभारी को एनकाउंटर की सूचना मिलती है, तो वह इसे तुरंत उचित रजिस्टर में लिखे।
- इसके तुरंत बाद इसे संज्ञेय अपराध मानकर जांच शुरू कर देनी चाहिए।
- अगर पुलिस दोषी साबित होती है, तो मरने वाले के परिवार को उचित मुआवजा मिलना चाहिए।