तीन तलाक कानून को संसद में पास हुए एक साल गुजर गया है। इस एक साल में क्या कुछ बदला है मुस्लिम महिलाओं के लिए क्या वास्तव में जैसा भाजपा कह रही है यह मुसलिम महिलाओं के लिए अधिकार दिवस है। इन सब मसलों पर जाने माने मुस्लिम सामाजिक कार्यकर्ता और इस्लामिक विद्वानों से बात की अमर उजाला संवादाता ने इन सभी ने तीन तलाक और महिला अधिकार दिवस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। इनका कहना है कानून तो बना लेकिन अमल में आने की राह में अभी रोड़े कम नहीं हैं।
तीन तलाक की लड़ाई को न्यायलय में ठोस तरीके से लड़ने वाले अश्वनी उपाध्याय कहते हैं, सरकारी आकड़ों के हिसाब से एक साल में 83 फीसदी तीन तलाक के मामलों में कमी आई है। इससे मुसलमान शौहर के मन में कानूनों का भय उत्पन्न हुआ है। उपाध्याय कहते हैं जिनके लिए उन्होंने यह लड़ाई लड़ी थी उन महिलाओं के लिए कानून के एक साल ने उन्हें समाज में सिर उठाकर चलने के लिए प्रेरित किया है। इस बिल ने देश की सभी महिलाओं के साथ मुसलमानों औरतों को भी एक श्रेणी में लाकर खड़ा किया है।
लखनऊ की नेहा जो खुद इसकी शिकार है और अपनी लड़ाई लड़ रही हैं, कहती है कि तीन तलाक कानून बन गया यह तो मुसलमान औरतों के हक के लिहाज से बड़ा कदम है। उन्हें समाज में अपनी लड़ाई लड़ने के लिए प्लेटफार्म तो मिल गया लेकिन यहां मौलाना काम बिगाड़ रहे हैं। अब देखना यह है कि इस कानून की कमजोरियों का फायदा उठाकर औरतों का और शोषण शुरू न हो जाए। नेहा को भी उसके शौहर ने पहले घर से यह कहकर निकाला की तुम अपने घर जाओ फिर उन्होंने तलाक एहसन डाक से भेज दिया अब तीन तलाक कानून के चलते मामला दर्ज हो गया है लेकिन देखिए कब तक इंसाफ मिलता है।
नाइश हसन सामाजिक कार्यकर्ता कहती हैं यह कानून तो बन गया है। अब इसे लागू कराना होगा क्योंकि एक साल में इसकी जमीनी हकीकत थोड़ी कड़वी है क्योंकि पुलिस ने इस तरह से मामलों को देखना और पुलिसिया कार्रवाई करना बंद कर दिया। उस पर अब मिली भगत करके तलाक ए अहसन का एक दरवाजा खोल दिया है, अब पहले महिला को सता कर भागते हैं, फिर कहते हैं कि फतवा दे रहे हैं कि बीबी खाना नहीं बनाती है देखभाल नहीं करती है।
क्योंकि तलाक ए एहसन मुस्लिम कानून के मुताबिक सुलह समझौता होता है, लेकिन यहां मौलवी से मिलकर एक तरफा कार्रवाई की जा रही है। इसलिए तीन तलाक कानून को लागू कराने के लिए जरूरी है कि इसके अमल के लिए प्रशासनिक सख्ती की जाए। नाइश कहती है उन्होंने पिछले एक साल में कम से कम 50 केस देखे हैं। कानून तो बन गया पर जमीन पर बहुत असर नहीं पड़ा है।
डॉ मंजूर आलम बख्त मुस्लिम विद्वान के मुताबिक तीन तलाक बिल के साल के सफर में समाज में बड़ा असर कहीं से परिलक्ष्ति नहीं हो रहा है, लेकिन समाज को चलाने के लिए समय समय पर रिफार्म की जरूरत रहती है और इस बिल को भी इसी दृष्टि से देखना चाहिए। रिफार्म हुए हैं जो जरूरी भी हैं, लेकिन इसका असर समाज पर कितना पड़ा तो मैं कहूंगा बिलकुल नहीं पड़ा।
हमें इन सामाजिक कुरतियों की जड़ों में जाना पड़ेगा। इसलिए समाज में सुधार के लिए जरूरी है कि औरतों और बच्चों की शिक्षा पर ध्यान दिया जाए। उन्हें सुरक्षा और संरक्षण देने की जरूरत है। हैरानी इस बात की है कि समाज इस ओर ध्यान ही नहीं दे रहा है वह केवल कानून बन जाने से ही खुशी जाहिर कर रहा है।
जानी मानी सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी का कहना है, तीन तलाक और बिल का मसला ठीक है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर फैसला सुनाया था यह स्वागत योग्य कदम था। इसमें होना यह चाहिए था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यदि कोई ऐसा करता तो उस पर घरेलू हिंसा के नियमों के तहत कार्रवाई हो सकती थी, क्योंकि यह मसला मुसलिम महिलाओं से जुड़ा है। इसलिए मुझे लगता है राजनीति के तहत इस पर कानून लेकर आया गया।
जहां तक सवाल एक साल में मुसलमानों औरतों की आजादी और अधिकारों की है तो मुझे लगता है पिछले एक साल में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक तीन तलाक से उसे कितनी आजादी मिली इसके आकड़े हैं नहीं लेकिन विभिन्न कारणों से मुसलमान औरतों में असुरक्षा बढ़ी है। पिछले एक साल की उथल-पुथल ने औरतों को रोजीरोटी से महरुम कर दिया। कोरोना संक्रमण ने तो हालात और खराब कर दिए। बकौल शबनम ऐसा लगता है मुसलिम अधिकार दिवस के नाम पर सरकार ने तीन तलाक जैसे सीरियस मसले को इवेंट मैनेजमेंट बना दिया।