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अमर उजाला विश्लेषण: वे पांच बातें, जो लखीमपुर वाली निडर प्रियंका गांधी को दादी इंदिरा से जुदा करती हैं

सार

आज प्रियंका गांधी के सामने राजनीति में आने का जो संदर्भ है, वह बहुत जटिल है। वे फ्री हैंड के अभाव से जूझ रही हैं। दूसरा, वे उस वक्त राजनीति में आई हैं, जब देश में भाजपा के हिंदुत्व एजेंडे की आंधी चल रही है। मोदी सरकार के दौरान भाजपा ने इस एजेंडे को जिस मजबूती के साथ आगे बढ़ाया है, उसका तोड़ निकालना कांग्रेस और प्रियंका गांधी के लिए आसान नहीं है...
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प्रियंका गांधी झाड़ू लगाते हुए - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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लखीमपुर खीरी में प्रियंका गांधी का झाड़ू लगाने वाला उनका एक वीडियो न केवल कांग्रेस पार्टी में, बल्कि आम जन में भी खूब देखा जा रहा है। बात शुरू होती है, इंदिरा गांधी से। लाल बहादुर शास्त्री की मौत के बाद वे प्रधानमंत्री बनीं। हालांकि 1959 में महज 38 साल की आयु में उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाल लिया था। अगर उनके जीवन से ढाई साल 'आपातकाल' के निकाल दें, तो इंदिरा ने डंके की चोट पर राज किया था। प्रियंका गांधी के साथ वैसा नहीं है। राजनीति में आने का जटिल संदर्भ, सामने हिंदुत्व की आंधी और मां द्वारा भाई की तुलना में कम प्राथमिकता, आदि कई ऐसी बातें हैं, जो राजनीतिक संघर्ष में लखीमपुर खीरी वाली निडर 'प्रियंका गांधी' को दादी इंदिरा से जुदा करती हैं। जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर और राजनीतिक विशेषज्ञ डॉ. आनंद कुमार कहते हैं, प्रियंका गांधी के राजनीतिक संघर्ष की शुरुआत 'अभाव' से हुई है। कम से कम पांच बातें ऐसी हैं, जो उन्हें अपनी दादी और देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से अलग करती हैं।

भाजपा के 'हिंदुत्व' से लड़ाई

आज प्रियंका गांधी के सामने राजनीति में आने का जो संदर्भ है, वह बहुत जटिल है। वे फ्री हैंड के अभाव से जूझ रही हैं। दूसरा, वे उस वक्त राजनीति में आई हैं, जब देश में हिंदुत्व की आंधी चल रही है। मोदी सरकार के दौरान भाजपा ने इस एजेंडे को जिस मजबूती के साथ आगे बढ़ाया है, उसका तोड़ निकालना कांग्रेस और प्रियंका गांधी के लिए आसान नहीं है। तीसरा, पुरुषवाद का मुकाबला प्रियंका को करना है। राजनीति के केंद्र में आज पुरुषों का बाहुल्य है। संसद एवं विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने का मुद्दा कहां है, सभी लोग उससे परिचित हैं।

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चौथी बात, कांग्रेस पार्टी में चल रही अंदरुनी गुटबाजी है। इस कारण प्रियंका को इंदिरा गांधी की तरह 'दिखने' और 'बनने' में काफी वक्त लग सकता है। जब इंदिरा गांधी ने पहली बार प्रधानमंत्री पद की कमान संभाली तो उन्होंने पार्टी में विरोधियों को ज्यादा आगे नहीं आने दिया। उसके बाद कुछ शोर हुआ, नाराज या महत्वकांक्षी नेताओं की आवाजाही हुई, लेकिन तब तक इंदिरा गांधी ने खुद को लोगों की नजर में स्थापित कर लिया था। नतीजा यह हुआ कि विरोधी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सके। पांचवीं बात, राजनीतिक पटल पर प्रियंका गांधी को भाई राहुल की तुलना में सोनिया गांधी की तरफ से कम प्राथमिकता मिल रही है। कुछ स्पष्ट नहीं हो रहा है कि आगे किसे जाना है और किसे नहीं।

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जनता को पसंद है उनके विरोध का तरीका

प्रो. आनंद बताते हैं, प्रियंका गांधी के सामने उनके पति रॉबर्ट वाड्रा को लेकर भी दिक्कतें आती रही हैं। इन सबके बावजूद प्रियंका गांधी एक निडर नेता के तौर पर लोगों के सामने आई हैं। कांग्रेस पार्टी आज जिस दोराहे पर खड़ी है, वहां सबसे ज्यादा जरूरी है उसका जनता से जुड़ाव। यह पार्टी आज लोगों के साथ संपर्क नहीं रख पा रही है। प्रियंका गांधी ने संघर्ष की एक उम्मीद दिखाई है। उनके विरोध का तरीका लोगों को पसंद आ रहा है। कांग्रेस पार्टी में आज सक्रिय कार्यकर्ताओं की कमी है। हां, नेताओं की भरमार है। ट्रेड यूनियन, दलित उत्थान और किसान, इन्हें लेकर कांग्रेस पार्टी हाशिये पर चली गई है। पार्टी के पास देश की जरूरत के साथ तालमेल करने वाला कार्यक्रम नहीं है। कांग्रेसी नेता अपनी ही राजनीति में ही उलझे हैं।

आम लोगों से जुड़ना होगा

भाजपा ने, 2014 में एक ऐसा मुद्दा उठाया, जिसके साथ अनेक समुदाय जुड़ गए। 'भ्रष्टाचार मुक्त भारत' इस नारे ने सभी को लुभाया। वही भाजपा आज हिंदुत्व की राजनीति को डंके की चोट पर आगे ले जा रही है। भविष्य की रूपरेखा के साथ जो पार्टी या नेता राजनीति नहीं करता, वह दिशाहीन हो जाता है। अगर सपा मुस्लिमों और यादवों का ख्याल रखती है, तो भाजपा हिंदुत्व के एजेंडे पर चलती है। ऐसे में कांग्रेस पार्टी, राष्ट्रीय एकता खतरे में है, इसे लोगों के बीच नहीं ले जा सकी। देश में आर्थिक धुंध है, किसान बुनकरों की सुनवाई नहीं हो रही। सामाजिक एकता में जहर घोलने वाली राजनीति चल रही है। कांग्रेस पार्टी, इन मुद्दों को भुना नहीं सकी। प्रियंका गांधी पर कोई दाग नहीं है। आनंद कुमार के मुताबिक, वे ममता बनर्जी या मायावती से बेहतर हैं। उन्हें युवा होने का लाभ मिल सकता है, लेकिन जब वे पार्टी के 'वाहन' पर सवार होती हैं, तो मालूम पड़ता है कि वह तो पंचर है। प्रियंका को आम लोगों से जुड़ना होगा। कांग्रेस पार्टी, आज ट्विटर की राजनीति कर रही है। उन्हें इस पार्टी को प्रतिक्रिया की राजनीति से बाहर निकालना होगा।
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