जीएसटी लागू होने से बढ़ीं दिक्कतें
केंद्र सरकार से दर्जनों बार आग्रह किया गया है कि चाय बागान को कृषि क्षेत्र में शामिल कर लें। अगर ये हो जाता तो फसलों की तरह 'चाय पैदावार' को भी 'एमएसपी' मिल सकता था। डीएम ग्रुप ऑफ कंपनी के डायरेक्टर कहते हैं, अब तो जीएसटी लागू हो गया है। पिछला जीएसटी क्लीयर नहीं है तो माल डिस्पैच नहीं कर सकते। सब कुछ डिजिटली है। गड़बड़ की संभावना ही खत्म हो गई है। सरकार, अगर ‘टीएमसी’ हटा दे, तो खरीददार हमारे बागानों से संपर्क कर सकेंगे। बोली केंद्र पर जाकर चाय उत्पादक फंस जाता है। नुकसान हो रहा है, लेकिन माल वापस नहीं आता। चाय को 'आवश्यक वस्तु अधिनियम' में भी शामिल नहीं कर रहे। ये उद्योग हर साल 7-8 हजार करोड़ रुपये के घाटे में जा रहा है।
चाय बागान मालिकों का कहना है कि सरकार अगर 'टीएमसी' को खत्म कर दे तो भी टी गार्डन जीवित रह सकते हैं। साथ ही इन्हें कृषि सेक्टर में शामिल किया जाए। एमएसपी तय कर करें। मौजूदा परिस्थितियों में जो हालात हैं, उनके लिए ये सब फौरी तौर पर काफी नहीं है। सरकार को, ग्रांट देनी चाहिए। कम से कम चार पांच करोड़ रुपये प्रति इंडस्ट्री ग्रांट जरूरी है। असम में चाय उद्योग को यदि पांच हजार करोड़ रुपये की आर्थिक मदद मिल जाती है तो वह आगे बढ़ जाएगा। सरकार, ये भी नहीं करना चाहती तो प्रति यूनिट चार पांच करोड़ रुपये का ब्याज मु्क्त लोन दिलवा दे। इससे करोड़ों लोगों का रोजगार बना रहेगा। कमलेश सिंह कहते हैं, ये ध्यान रहे कि अब सरकार ने उक्त उपायों में से अगर कुछ नहीं किया तो ये मान लें कि देश में चाय बागान लंबे समय तक नहीं दिखाई देंगे।