अफगानिस्तान पर तालिबान के आधिपत्य के बाद भारत की कई मोर्चे पर चुनौतियां बढ़ गई हैं। भारत को अफगानिस्तान में अपने व्यापक निवेश, नागरिकों की सुरक्षा की चिंता है। इसके अलावा तालिबान की मजबूती भारत के लिए सुरक्षा और आतंकवाद की दृष्टि से भी बड़ी चुनौती है।
यही कारण है कि अन्य देशों की तरह भारत भी अफगानिस्तान में तालिबान शासन को मान्यता देने के मामले में देखो और इंतजार करो की रणनीति अपना रहा है। भारत इस संदर्भ में अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी के भावी रुख को भांपने के बाद फैसला करने का इच्छुक है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, पीएम मोदी जल्द ही उन देशों के शासनाध्यक्षों से भी बातचीत करेंगे जिसकी अफगानिस्तान में मजबूत भूमिका है। फिलहाल भारत की पहली प्राथमिकता अफगानिस्तान में फंसे अपने नागरिकों के अलावा अल्पसंख्यक बिरादरी को सुरक्षित बाहर निकालने की है। फिलहाल राहत एवं बचाव कार्य मामले में काबुल एयरपोर्ट पर कई देशों के बीच सहयोग जारी है।
कल विपक्ष के सामने सरकार रखेगी अपना पक्ष
सरकार पहली बार बृहस्पतिवार को सर्वदलीय बैठक में विपक्ष के सामने अफगानिस्तान के संदर्भ में अपना पक्ष रखेगी। विदेशमंत्री एस जयशंकर विपक्षी नेताओं को अफगानिस्तान के ताजा हालात, राहत एवं बचाव कार्य सहित भावी रणनीति से अवगत कराएंगे। वर्तमान में प्रतिदिन दो उड़ानों के माध्यम से भारत वहां फंसे लोगों को बाहर निकालने में जुटा है। भारत की योजना उड़ानों की संख्या बढ़ाने की है।
अफगानिस्तान में बढ़ रहे संकट और तालिबान की तरफ से 31 अगस्त की समयसीमा में बढ़ोतरी नहीं करने की घोषणा के बाद सभी देशों ने अपने नागरिकों को निकालने का अभियान तेज कर दिया है। भारत को इस काम में छह देशों अमेरिका, ब्रिटेन, संयुक्त अरब अमीरात, फ्रांस, जर्मनी और कतर ने भी मदद देने पर सहमति जताई है। अधिकृत सूत्रों के मुताबिक, ये देश उन भारतीय नागरिकों को अफगानिस्तान से बाहर निकालेंगे, जो वहां उनके या उनकी कंपनियों के लिए काम कर रहे थे। बाद में भारत इन सभी को उनके यहां से वापस स्वदेश लेकर आएगा।