सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा-309 और मानसिक स्वास्थ्य कानून के प्रावधानों में असंगति का परीक्षण करने का निर्णय लिया है। शीर्ष अदालत ने अटॉर्नी जनरल को नोटिस जारी कर केंद्र सरकार से पूछा है कि आखिर इस कानून के प्रावधान को कैसे उचित ठहराया जा सकता है, जो किसी व्यक्ति को गंभीर तनाव की स्थिति में परोक्ष रूप से खुदकुशी करने की अनुमति देता है।
आईपीसी की धारा-309 की वैधता को चुनौती देने वाली एक लंबित याचिका के साथ जोड़ दिया
चीफ जस्टिस एस ए बोबडे की तीन सदस्यीय पीठ ने मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 2017 की धारा-115 व आईपीसी की धारा-309 (आत्महत्या के प्रयास) की खामियों की समीक्षा का निर्णय लिया है। मालूम हो कि धारा-309 दंडनीय अपराध है, जिसमें एक वर्ष कैद की सजा का प्रावधान है। पीठ ने कहा, हमारा मानना है कि मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 2017 की धारा 115 आईपीसी की धारा-309 पर प्रभाव डालती है।
शीर्ष अदालत ने इस मामले को आईपीसी की धारा-309 की वैधता को चुनौती देने वाली एक लंबित याचिका के साथ जोड़ दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ वकील एएन एस नादकर्णी को इस मामले में सहायता करने के लिए न्याय मित्र बनाया है।