सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि अनुसूचित जाति और जनजाति के खिलाफ अत्याचार अतीत की बात नहीं है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत आरोपियों को जमानत देने पर विचार करते समय पीड़ितों को अनिवार्य नोटिस की वैधानिक आवश्यकता को समाप्त नहीं किया जा सकता है।
जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने अपने एक फैसले में कहा कि एससी और एसटी के सदस्यों के खिलाफ अत्याचार अतीत की बात नहीं है। वे आज भी हमारे समाज में बने हुए हैं। इसलिए संसद द्वारा एससी-एसटी से संबंधित व्यक्तियों के सांविधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए प्रावधानों को ईमानदारी से लागू किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में आरोपी की जमानत रद्द कर दी है क्योंकि जमानत देने से पहले शिकायतकर्ता (एससी-एसटी के सदस्य) को कोई नोटिस नहीं दिया गया था।
पीठ ने अपने आदेश में कहा कि अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा-15ए में जमानत, पैरोल, आरोपमुक्तआदि के संबंध में पीड़ितों को समय पर नोटिस देने का महत्वपूर्ण प्रावधान है जो जाति-आधारित अत्याचारों, गवाहों और पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा करते हैं।
पीठ ने कहा कि भारत में जांच, पुलिस के अधिकारक्षेत्र में है। आपराधिक न्याय प्रणाली में पीड़ितों को अक्सर एक दर्शक की भूमिका में लिया जाता है। एससी-एसटी के पीड़ितों को विशेष रूप से आपराधिक न्याय प्रणाली में प्रक्रियात्मक खामियों के कारण नुकसान उठाना पड़ता है। उन्हें उच्च जाति समूहों के सदस्यों से प्रतिशोध का डर, पुलिस की उदासीनता का सामना करना पड़ता है। उन लोगों को डराने-धमकाने, हिंसा और सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार आदि का डर होता है। घटिया जांच और लापरवाही के कारण एससी-एसटी अधिनियम के तहत दोष सिद्धि दर कम हुई है। जिससे यह गलत धारणा पैदा हुई है कि अधिनियम के तहत दर्ज मामले झूठे हैं और इसका दुरुपयोग किया जा रहा है।
केरल हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र को नोटिस
एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने छात्रवृत्ति में अल्पसंख्यकों के वर्गीकरण के फैसले को खारिज करने वाले केरल हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र व अन्य को नोटिस जारी किया है। केरल सरकार ने योग्यता कम साधन छात्रवृत्ति देने के लिए अल्पसंख्यकों का उप वर्गीकरण का आदेश दिया था।
जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने केरल सरकार की याचिका पर अल्पसंख्यक मंत्रालय, केरल राज्य अल्पसंख्यक आयोग और अन्य को नोटिस जारी कर चार हफ्तों में जवाब मांगा है। केरल हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार के आदेश को 28 मई को खारिज कर दिया था। केरल सरकार ने 80 फीसदी छात्रवृत्ति मुस्लिम समुदाय को और 20 फीसदी छात्रवृत्ति ईसाईयों को दी थी। केरल सरकार ने हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।