सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अपने एक फैसले में कहा है कि सजा देना न्याय का एकमात्र तरीका नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि हाईकोर्ट, सीआरपीसी की धारा-482 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए अपराध की प्रकृति व जघन्यता और अन्य तथ्यात्मक तथ्यों को ध्यान में रखते हुए गैर समझौते वाले अपराधों के मामले में भी कार्यवाही को रद्द कर सकता है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि गैर-जघन्य अपराधों या जहां अपराध मुख्य रूप से निजी प्रकृति का हो तो उस मुकदमे को रद्द किया जा सकता है भले ही ट्रायल पहले ही समाप्त हो चुका है या दोषसिद्धि के खिलाफ अपील खारिज कर दी गई हो।
चीफ जस्टिस एनवी रमण और जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि सजा देना न्याय देने का एकमात्र तरीका नहीं है। ऐसे में हाईकोर्ट अपराध की प्रकृति और इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि पक्षकारों ने अपने विवाद को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझा लिया है और पीड़ित ने स्वेच्छा से आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने के लिए सहमति व्यक्त की है, तो वह धारा-482 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए ऐसी कार्यवाही को रद्द कर सकता है भले ही वह गैर-समझौता वाला अपराध ही क्यों न हो। हाईकोर्ट किसी व्यक्ति के शरीर से परे अपराध के परिणामी प्रभावों का मूल्यांकन कर सकता है और उसके बाद एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपना सकता है।
हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि सीआरपीसी की धारा-482 के तहत हाईकोर्ट और संविधान के अनुच्छेद-142 के तहत सुप्रीम कोर्ट को शक्तियों का प्रयोग आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने के संदर्भ में सावधानी, समाज की चेतना पर अपराध की प्रकृति व प्रभाव, चोट की गंभीरता, अभियुक्त व पीड़ित के बीच समझौता करने की स्वैच्छिक प्रकृति आदि को ध्यान में रखते हुई करना चाहिए। जिन मामलों में दोषसिद्धि के बाद समझौता किया जाता है, हाईकोर्ट को घटना के आसपास की परिस्थितियों और जिस तरह से समझौता किया गया है, उस पर गौर करते हुए अपने शक्ति का इस्तेमाल करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय दो अपीलों में दिया। एक अपील मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से और दूसरा कर्नाटक हाईकोर्ट से आया था। दोनों मामलों में पक्षों के बीच समझौता होने के बाद भी गैर-समझौते वाले अपराधों को खत्म नहीं किया गया था।