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SC: नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर बोली अदालत- शीघ्र फैसला संवैधानिक दायित्व; हर दिन की देरी मायने रखती है

Thu, 12 Sep 2024 11:06 PM IST
ज्योति भास्कर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर शीर्ष अदालत ने अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि शीघ्र फैसला पदाधिकारियों का संवैधानिक दायित्व है। शीर्ष अदालत ने कहा कि हिरासत में लिए गए लोगों के मामलों में हर दिन की देरी मायने रखती है।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
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उच्चतम न्यायालय में न्यायमूर्ति बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामले में अहम टिप्पणी की है। बृहस्पतिवार को अदालत ने कहा कि नागरिकों की 'व्यक्तिगत स्वतंत्रता' से संबंधित मामलों में शीघ्रता से निर्णय लेना अधिकारियों का संवैधानिक दायित्व है। कोर्ट ने साफ किया कि ऐसे मामले में एक दिन की देरी भी मायने रखती है। पीठ ने अप्पिसेरिल कोचू मोहम्मद शाजी नाम के शख्स की हिरासत की पुष्टि करने वाले आदेश को रद्द कर दिया। बता दें कि सर्वोच्च न्यायालय ने 31 जुलाई को अपने आदेश में बंदी को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया था। 
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शीघ्रता से निर्णय लेने का संवैधानिक दायित्व, लेकिन जेल अधिकारियों ने लापरवाही दिखाई
जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ में न्यायमूर्ति पीके मिश्रा और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन भी शामिल हैं। पीठ ने इस बात को रेखांकित किया कि बंदी की तरफ से प्रस्तुत अभ्यावेदन पर निर्णय लेने में लगभग नौ महीने की देरी हुई। पीठ ने 60 पन्नों के अपने विस्तृत आदेश में कहा, नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित मामलों में अधिकारियों को अत्यंत शीघ्रता से निर्णय लेने का संवैधानिक दायित्व सौंपा गया है। वर्तमान मामले में  जेल अधिकारियों ने लापरवाही दिखाई। उदासीन और उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण के कारण बंदी का प्रतिवेदन उचित समय के भीतर बंदी प्राधिकारी और केंद्र सरकार तक नहीं पहुंच सका। नतीजतन फैसला लेने में लगभग नौ महीने की देरी हो चुकी है।

पिछले साल 27 सितंबर को आवेदन; जेल अधिकारियों ने दिखाई लापरवाही
पीठ ने बंदी की पत्नी की तरफ से दायर अपील पर फैसला सुनाया। बंदी की पत्नी ने केरल उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी थी। मार्च में हाईकोर्ट ने पति को सशरीर पेश करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी थी। बंदी ने पिछले साल 27 सितंबर को अपना पक्ष जेल अधिकारियों को सौंपा था, ताकि उसे हिरासत में लिए गए अधिकारी और केंद्र को भेजा जा सके। पीठ ने कहा कि जेल अधिकारियों ने केवल साधारण डाक के माध्यम से अपना भेजा था। यह न तो हिरासत में लेने वाले अधिकारियों तक और न ही केंद्र सरकार तक पहुंचा। अदालत ने दोहराया कि  केंद्रीय कारागार और सुधार गृह के अधीक्षक ने पूरी तरह से लापरवाही से काम किया है।
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