पेंटागन से जुड़े लोगों ने संकेत दिए हैं कि अफगानिस्तान में आगे भी और धमाके हो सकते हैं। एयरपोर्ट के आसपास 'आईएस-खोरासन' के 'सौ' आत्मघाती आतंकी मौजूद हैं। उन्हें भीड़ वाली जगहों पर ब्लास्ट करने के लिए ट्रेंड किया गया है। दूसरी तरफ, पाकिस्तान, तालिबान के साथ मिलकर आतंकियों को नए टॉस्क देने की तैयारी कर रहा है। अब इस्लामिक आतंकवाद की जगह पर 'जिहाद टेरेरिज्म' शब्द का इस्तेमाल हो रहा है। नए आतंकी नेटवर्क में तालिबानी लड़ाके, हक्कानी नेटवर्क, इंडियन मुजाहिदीन, जैश-ए-मोहम्मद, एलईटी, टीआरएफ और आईएस-खोरासन सहित करीब 35 आतंकी संगठन हैं। तालिबान ने इनमें से अधिकांश संगठनों के सदस्यों को अफगान जेलों से रिहा कर दिया है। इसी तरह से पाकिस्तान ने भी तालिबान समर्थक आतंकियों को अपनी जेलों से बाहर निकाल दिया है। इसी में आईएसआई ने जेएएम से जुड़े करीब सौ आतंकियों को रिहा करा लिया है। अब कहा जा रहा है कि इन्हें कश्मीर में भेजा जा सकता है। भारतीय सुरक्षा एजेंसियां इस बाबत सतर्क हो गई हैं।
पिछले एक दशक के दौरान कई आतंकी संगठन तालिबान से नाराज होते रहे हैं। जब तालिबान ने संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ शांति वार्ता शुरू की तो उन्हें लगा कि वह जानबूझकर समझौता कर रहा है। इस बात से असंतुष्ट आतंकी इस्लामिक स्टेट में चले गए। ऐसे में इनकी संख्या बढ़ती चली गई। हालांकि उनके बीच कभी कोई बड़ी तकरार नहीं देखी गई। दोनों तरफ से कुछ हमलों को अंजाम दिया गया, लेकिन बातचीत होती रही। जब तालिबान ने अपने कथित संघर्ष को अफगानिस्तान तक सीमित कर लिया तो अफगानिस्तान और पाकिस्तान में इस्लामिक स्टेट ने गैर-मुसलमानों के खिलाफ दुनियाभर में जिहाद शुरू करने का एलान कर दिया।
पाकिस्तान के अल्पसंख्यक शिया मुस्लिमों पर भी हमले हुए। अल-कायदा के लड़ाके शुरू से ही तालिबान में एकीकृत रहे हैं। आज तालिबान कुछ कहे, लेकिन उसने लादेन और उसके समूह को शरण दी थी। लादेन की मौत के बाद एक वह वक्त भी आया जब तालिबान ने अमेरिका के साथ मिलकर अफगानिस्तान में इस्लामिक स्टेट समूह के खिलाफ हमले कर दिए। अफगानिस्तान के उत्तर-पूर्व के कुछ हिस्सों से इस्लामिक स्टेट को खदेड़ने का प्रयास किया गया। आज की स्थिति में तालिबान ने दोबारा से 35 आतंकी संगठनों को एक साथ ले लिया है। काबुल शहर की सुरक्षा की जिम्मेदारी हक्कानी नेटवर्क को देने का मतलब समझा जा सकता है। अमेरिका की सबसे बड़ी आशंका यह है कि तालिबान शासन के तहत अफगानिस्तान फिर से पश्चिम पर हमले की साजिश रचने वाले चरमपंथियों के लिए एक चुंबक और आधार तो नहीं बन जाएगा।