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काबुल एयरपोर्ट पर हमला: श्रीलंका के बुरे अनुभव ने भारत को अफगानिस्तान में 'की-प्लेयर' बनने से रोका

सार

राजनीतिक एवं सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ कैप्टन अनिल गौर (रिटायर्ड) कहते हैं, अफगानिस्तान के साथ भारत की जमीनी सीमा भी नहीं मिलती है। वायु मार्ग के लिए पाकिस्तान या चीन की सीमा का इस्तेमाल करना पड़ता है। ये दोनों देश मना कर दें तो अफगानिस्तान तक पहुंचने का रास्ता ईरान से बचता है...
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काबुल एयरपोर्ट पर आत्मघाती हमला - फोटो : Agency
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विस्तार
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तालिबान के बदलते बयानों और हरकतों के चलते, भारत कूटनीतिक तरीके से कदम आगे रख रहा है। जानकारों का कहना है, पिछले दशक में भारत और अफगानिस्तान के बीच अच्छे रिश्ते रहे हैं। भारत ने वहां पर बड़े प्रोजेक्ट में निवेश भी किया है। अफगानिस्तान को कई तरीके से मदद भी पहुंचाई है। ऐसे में भारत, अगर वहां पर अमेरिका और दूसरे नाटो देशों की सहमति से अपने 15-20 हजार सैनिक भेज देता है तो आज की स्थिति में 'की-प्लेयर' या उसके नजदीक खड़ा होता। राजनीतिक एवं सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ कैप्टन अनिल गौर (रिटायर्ड) कहते हैं, ये सब इतना आसान नहीं है। श्रीलंका में शांति सेना भेजने का खामियाजा, देश भुगत चुका है। भारत को उस बुरे अनुभव के चलते अपना प्रधानमंत्री खोना पड़ा। अब अमेरिका 'आईएस-खोरासन' के 100 आत्मघाती दस्तों से निपटेगा तो भारत भी जैश-ए-मोहम्मद के उन 100 आतंकियों को नहीं छोड़ेगा, जिन्हें पाकिस्तानी आईएसआई ने अफगान जेलों से रिहा करा कर जम्मू-कश्मीर में भेजने की रणनीति बनाई है।

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अफगानिस्तान के साथ भारत की जमीनी सीमा भी नहीं मिलती है। वायु मार्ग के लिए पाकिस्तान या चीन की सीमा का इस्तेमाल करना पड़ता है। ये दोनों देश मना कर दें तो अफगानिस्तान तक पहुंचने का रास्ता ईरान से बचता है। इन परिस्थितियों में भारत के लिए वहां पांव फंसाना एक मुश्किल भरा कदम होता। बतौर कैप्टन अनिल गौर, श्रीलंका का उदाहरण हमारे सामने है। वहां शांति सेना भेजी गई थी। श्रीलंका में सेना भेजने का अनुभव बहुत खराब रहा था। वह एक समझदारी वाला कदम नहीं था। यह बात सही है कि पिछले दशक में हिंदुस्तान की अफगानिस्तान में अच्छी साख रही है। भारत का स्टाफ वहां के अस्पतालों में काम कर रहा है। वहां बड़े प्रोजेक्ट में भारत की हिस्सेदारी है। तालिबान इसे समझता है। अफगानिस्तान पर कब्जा करने के बाद तालिबान ने कहा था कि विभिन्न प्रोजेक्ट पर काम करने वाले भारतीय लोग ठहर सकते हैं। उन्हें कोई खतरा नहीं है।
 
लिहाजा, अफगानिस्तान में दिन-प्रतिदिन माहौल बिगड़ता जा रहा था। ऐसे में भारत के लिए अपने लोगों को वहां छोड़ना जोखिम भरा कदम होता। अगर अब वहां से लोगों को बाहर नहीं निकाला जाता तो आगे उनके सुरक्षित लौटने की कोई गारंटी नहीं थी। केंद्र ने सही समय पर कदम उठाया, जिससे भारतीयों की सकुशल स्वदेश वापसी संभव हो सकी। पाकिस्तान तो शुरू से ही नहीं चाहता है कि अफगानिस्तान में भारत की गुडविल बने। भारत ने वहां पर जब बड़े प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया तो वह बात पाकिस्तान को बहुत पीड़ा पहुंचा रही थी। वहां पर चीन भी अपनी सेना नहीं भेजता। अनिल गौर ने कहा, दूसरे मुल्क में सेना भेजना इतना आसान नहीं होता। अमेरिकी की अलग बात थी। वहां एक पॉलिसी मैटर काम करता है। हर देश उस पॉलिसी को नहीं अपना सकता।

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पेंटागन से जुड़े लोगों ने संकेत दिए हैं कि अफगानिस्तान में आगे भी और धमाके हो सकते हैं। एयरपोर्ट के आसपास 'आईएस-खोरासन' के 'सौ' आत्मघाती आतंकी मौजूद हैं। उन्हें भीड़ वाली जगहों पर ब्लास्ट करने के लिए ट्रेंड किया गया है। दूसरी तरफ, पाकिस्तान, तालिबान के साथ मिलकर आतंकियों को नए टॉस्क देने की तैयारी कर रहा है। अब इस्लामिक आतंकवाद की जगह पर 'जिहाद टेरेरिज्म' शब्द का इस्तेमाल हो रहा है। नए आतंकी नेटवर्क में तालिबानी लड़ाके, हक्कानी नेटवर्क, इंडियन मुजाहिदीन, जैश-ए-मोहम्मद, एलईटी, टीआरएफ और आईएस-खोरासन सहित करीब 35 आतंकी संगठन हैं। तालिबान ने इनमें से अधिकांश संगठनों के सदस्यों को अफगान जेलों से रिहा कर दिया है। इसी तरह से पाकिस्तान ने भी तालिबान समर्थक आतंकियों को अपनी जेलों से बाहर निकाल दिया है। इसी में आईएसआई ने जेएएम से जुड़े करीब सौ आतंकियों को रिहा करा लिया है। अब कहा जा रहा है कि इन्हें कश्मीर में भेजा जा सकता है। भारतीय सुरक्षा एजेंसियां इस बाबत सतर्क हो गई हैं।

पिछले एक दशक के दौरान कई आतंकी संगठन तालिबान से नाराज होते रहे हैं। जब तालिबान ने संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ शांति वार्ता शुरू की तो उन्हें लगा कि वह जानबूझकर समझौता कर रहा है। इस बात से असंतुष्ट आतंकी इस्लामिक स्टेट में चले गए। ऐसे में इनकी संख्या बढ़ती चली गई। हालांकि उनके बीच कभी कोई बड़ी तकरार नहीं देखी गई। दोनों तरफ से कुछ हमलों को अंजाम दिया गया, लेकिन बातचीत होती रही। जब तालिबान ने अपने कथित संघर्ष को अफगानिस्तान तक सीमित कर लिया तो अफगानिस्तान और पाकिस्तान में इस्लामिक स्टेट ने गैर-मुसलमानों के खिलाफ दुनियाभर में जिहाद शुरू करने का एलान कर दिया।

पाकिस्तान के अल्पसंख्यक शिया मुस्लिमों पर भी हमले हुए। अल-कायदा के लड़ाके शुरू से ही तालिबान में एकीकृत रहे हैं। आज तालिबान कुछ कहे, लेकिन उसने लादेन और उसके समूह को शरण दी थी। लादेन की मौत के बाद एक वह वक्त भी आया जब तालिबान ने अमेरिका के साथ मिलकर अफगानिस्तान में इस्लामिक स्टेट समूह के खिलाफ हमले कर दिए। अफगानिस्तान के उत्तर-पूर्व के कुछ हिस्सों से इस्लामिक स्टेट को खदेड़ने का प्रयास किया गया। आज की स्थिति में तालिबान ने दोबारा से 35 आतंकी संगठनों को एक साथ ले लिया है। काबुल शहर की सुरक्षा की जिम्मेदारी हक्कानी नेटवर्क को देने का मतलब समझा जा सकता है। अमेरिका की सबसे बड़ी आशंका यह है कि तालिबान शासन के तहत अफगानिस्तान फिर से पश्चिम पर हमले की साजिश रचने वाले चरमपंथियों के लिए एक चुंबक और आधार तो नहीं बन जाएगा।
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