कैप्टन गौर कहते हैं, यहां मेरा मतलब किसी फौजी अधिकारी को सीएपीएफ में लगाना नहीं है। वह केवल ट्रेनिंग पैटर्न तैयार करे, साथ ही ट्रेनिंग भी दे। सीएपीएफ को सेना की तर्ज पर तैयार किया जाए। इसके अलावा बॉर्डर पर स्मार्ट फेंसिंग, ड्रोन और सैटेलाइट ऑब्जर्वेशन (रियल टाइम) जैसे उपकरण लगाने होंगे। सीमा पर बहुत से इलाके ऐसे हैं जहां ड्रोन नहीं उड़ पाता। ऐसे में वहां से सूचना बराबर मिलती रहे, इसके लिए सैटेलाइट ऑब्जर्वेशन बहुत जरूरी है। सुरक्षा बलों में बाकी दूसरी तकनीकें भी अपग्रेड करनी होंगी।
तालिबानी लड़ाके अमेरिकी एम16 जैसे हथियारों से लैस हैं। भारत ने पिछले कुछ समय में ऐसे हथियारों की खरीद प्रक्रिया शुरू की है। ऐसे में ट्रेनिंग और उपकरणों पर खास ध्यान देना होगा। जम्मू-कश्मीर के इलाकों में सीआरपीएफ के पास दो ही कैंप 'आरटीसी' व 'लेथपोरा' ऐसे हैं, जहां कोई जवान या अधिकारी सौ मीटर चल सकता है। बाकी सेंटरों की स्थिति दयनीय है। कहीं गैस्ट हाउस में तो कहीं होटल में जवानों को रहना पड़ रहा है। टनल से लेकर श्रीनगर तक को आरओपी देने वाले बल के पास सुविधाओं का अभाव है।
सीआरपीएफ के सूत्रों का कहना है, अगर सड़क के साथ लगते इलाकों में बेहतर व स्थायी कैंप स्थापित कर दिए जाएं तो सीआरपीएफ ज्यादा अच्छे से अपनी ड्यूटी को अंजाम दे सकती है। सार्वजनिक संपत्ति की हिफाजत आसान हो जाएगी। सेना की आरआर इकाई के कैंप को बॉर्डर पर शिफ्ट कर दिया जाए। आंतरिक सुरक्षा का जिम्मा सीआरपीएफ को सौंपा जाए। भारतीय सुरक्षा बलों के चलते ही यह संभव हो सका है कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद घाटी में दोबारा से माहौल को अशांत नहीं होने दिया गया। अब दोबारा से स्थिति को बिगाड़ने के प्रयास हो रहे हैं। कभी महबूबा मुफ्ती का विरोधी बयान आता है तो दूसरी ओर युवाओं को रास्ते से भटकाने की कोशिश होती है।
सीआरपीएफ अधिकारी के मुताबिक तालिबान और पाकिस्तान के आतंकियों से निपटने के लिए जम्मू-कश्मीर में कम से कम बीस हजार अतिरिक्त जवानों की तैनाती करनी होगी। यानी बीस बटालियन खड़ी की जाएं। ट्रेनिंग में व्यापक सुधार लाना होगा। जहां जरूरी है, वहां कैंप नहीं हैं। सीआरपीएफ के पास कुल तीन सेक्टर हैं। दो कश्मीर में और एक जम्मू में है। अर्बन टेरेरिज्म को खत्म करने के लिए नए सेक्टर खोले जाने चाहिए। पुंछ-राजौरी की जनसंख्या इतनी मिली जुली है कि वहां पर सीआरपीएफ का एक ट्रेनिंग सेंटर होना आवश्यक है। चार पांच आईजी होंगे तो बेहतर रणनीति पर काम हो सकेगा। सीएपीएफ को नए हथियार, वाहन और संचार उपकरण मुहैया कराने होंगे। अगर ये सब बदलाव बहुत जल्द हो पाते हैं तो सीआरपीएफ के जवान तालिबानी लड़ाकों और पाकिस्तानी आतंकियों को मुंह तोड़ जवाब दे सकते हैं।