बतौर गुप्ता, सुरक्षा को लेकर भारत को अभी ज्यादा चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। भारतीय बॉर्डर और आंतरिक सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है। पाकिस्तान, तालिबान का फायदा उठाएगा, ये तय है। वह अफगानिस्तान में अपनी एयरफोर्स सुरक्षा को लेकर कोई रणनीतिक कदम उठा सकता है। पाकिस्तान अपने न्यूक्लियर हथियार बचाने के लिए अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल कर सकता है। इसके अलावा सबसे अहम बात, पाकिस्तान में चल रहे आतंकी कैंपों को अफगानिस्तान में शिफ्ट करने की संभावना है। अगर पाकिस्तान इस पॉलिसी पर चलता है तो वह आने वाले दिनों में सीज फायर तोड़ सकता है। चीन के बारे में कहावत है कि वह लोन देता है, डोनेशन नहीं, तालिबानी शासकों को यह बात अपने दिमाग में रखनी होगी। आज भले ही चीन और पाकिस्तान, अफगानिस्तान में हुए बदलाव को अपने हित में देख रहे हैं, लेकिन आगे क्या होगा, अभी इस पर सटीक तौर से कुछ नहीं कहा जा सकता।
भारत ने पिछले एक दशक के दौरान अफगानिस्तान में भारी पैमाने पर निवेश किया है। वहां पर लगभग 500 ऐसी छोटी-बड़ी परियोजनाएं चल रही हैं, जिनमें भारत का पैसा और तकनीक लगी है। इनमें पुल, डैम, हाई-वे प्रोजेक्ट, स्कूल और अस्पताल आदि शामिल हैं। भारत सरकार, करोड़ों रुपये खर्च कर ईरान के चाबहार बंदरगाह को विकसित कर रही है। इसे जोड़ने वाला मार्ग अफगानिस्तान से होकर जाता है। ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता (रिटायर्ड) कहते हैं, तालिबान को भी पैसा चाहिए। वह भारत की शक्ति को अच्छे से पहचानता है। उसे ये भी मालूम है कि चीन और पाकिस्तान से उसे आर्थिक सहायता नहीं मिलेगी। तालिबान को दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ेगा।
चीन की मदद को दुनिया जानती है, इसलिए तालिबान उससे बचकर चलेगा। अभी कतर में हुए समझौते की अहम बातें सार्वजनिक नहीं हुई हैं। उससे आगे की रणनीति का पता चल सकता है। रही बात भारत की सैन्य तैयारी की, वह किसी भी वक्त तालिबान को जवाब दे सकता है। भारतीय सेना हर तरह से सक्षम है। तालिबान की मदद से चीन और पाकिस्तान कुछ गलत न करें, इस पर ही पैनी निगाह रखनी होगी। संभव है कि अल-कायदा, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी समूहों को ज्यादा अनियंत्रित स्थान मिले, लेकिन इन्हें भारत जब चाहे माकूल जवाब दे सकता है।