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खतरा: तालिबान के कब्जे का पहला संभावित असर, सीजफायर तोड़ सकता है पाकिस्तान, 'दोनों पड़ोसियों' से रहना होगा चौकन्ना

सार

साल 2018 में पाकिस्तान ने 2140 बार, 2019 में 3479 बार और 2020 में 5133 बार युद्ध विराम नीति का उल्लंघन किया था। इस साल पाकिस्तान ने जून माह तक 664 बार सीमा पर युद्ध विराम नीति को तोड़ा है। 25 फरवरी को दोनों देशों के सैन्य ऑपरेशनों के महानिदेशकों के बीच हॉटलाइन पर हुई वार्ता के बाद नियंत्रण रेखा पर युद्ध विराम नीति का कड़ाई से पालन करने पर सहमति हुई थी...
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पाकिस्तान से सटी भारतीय सीमा - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा हो गया है। हालांकि अभी तक तालिबान ने अपनी तरफ से किसी आधिकारिक रणनीति का खुलासा नहीं किया है, लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञों को कई तरह की संभावनाएं नजर आने लगी हैं। सुरक्षा मामलों के विश्लेषक ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता (रिटायर्ड) बताते हैं, अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे का पहला संभावित असर यह हो सकता है कि पाकिस्तान सीजफायर तोड़ दे। दूसरा, भारत को अपने दो पड़ोसियों यानी 'पाकिस्तान और चीन' के गठजोड़ पर अब ज्यादा ध्यान देना पड़ेगा। ये दोनों देश, अब तालिबान की मदद से कोई भी गलत कदम उठा सकते हैं। आज के दिन भारतीय बॉर्डर पूरी तरह महफूज हैं। अगर तालिबान की ओर से भारत की सुरक्षा को लेकर कोई खतरा पैदा किया जाता है तो उस पर हिन्दुस्तान चुप नहीं बैठेगा। वह 'हिट' करने के लिए सदैव तैयार है।

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बता दें कि मौजूदा समय में भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम चल रहा है। साल 2018 में पाकिस्तान ने 2140 बार, 2019 में 3479 बार और 2020 में 5133 बार युद्ध विराम नीति का उल्लंघन किया था। इस साल पाकिस्तान ने जून माह तक 664 बार सीमा पर युद्ध विराम नीति को तोड़ा है। 25 फरवरी को दोनों देशों के सैन्य ऑपरेशनों के महानिदेशकों के बीच हॉटलाइन पर हुई वार्ता के बाद नियंत्रण रेखा पर युद्ध विराम नीति का कड़ाई से पालन करने पर सहमति हुई थी। इसके बावजूद पाकिस्तान ने अप्रैल में एक, मई में तीन और जून में दो बार इस नीति का उल्लंघन किया है। सुरक्षा मामलों के विश्लेषक ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता (रिटायर्ड) के अनुसार, पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आता है। किसी न किसी तरह वह घाटी में आतंकवाद को बढ़ावा देता रहता है। अब अफगानिस्तान में 'तालिबान' का कब्जा है और पाकिस्तान उसके बहुत करीब है। ये अलग बात है कि तालिबान यह घोषणा करता आया है कि वह अपनी धरती को भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल नहीं होने देगा।

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बतौर गुप्ता, सुरक्षा को लेकर भारत को अभी ज्यादा चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। भारतीय बॉर्डर और आंतरिक सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है। पाकिस्तान, तालिबान का फायदा उठाएगा, ये तय है। वह अफगानिस्तान में अपनी एयरफोर्स सुरक्षा को लेकर कोई रणनीतिक कदम उठा सकता है। पाकिस्तान अपने न्यूक्लियर हथियार बचाने के लिए अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल कर सकता है। इसके अलावा सबसे अहम बात, पाकिस्तान में चल रहे आतंकी कैंपों को अफगानिस्तान में शिफ्ट करने की संभावना है। अगर पाकिस्तान इस पॉलिसी पर चलता है तो वह आने वाले दिनों में सीज फायर तोड़ सकता है। चीन के बारे में कहावत है कि वह लोन देता है, डोनेशन नहीं, तालिबानी शासकों को यह बात अपने दिमाग में रखनी होगी। आज भले ही चीन और पाकिस्तान, अफगानिस्तान में हुए बदलाव को अपने हित में देख रहे हैं, लेकिन आगे क्या होगा, अभी इस पर सटीक तौर से कुछ नहीं कहा जा सकता।



भारत ने पिछले एक दशक के दौरान अफगानिस्तान में भारी पैमाने पर निवेश किया है। वहां पर लगभग 500 ऐसी छोटी-बड़ी परियोजनाएं चल रही हैं, जिनमें भारत का पैसा और तकनीक लगी है। इनमें पुल, डैम, हाई-वे प्रोजेक्ट, स्कूल और अस्पताल आदि शामिल हैं। भारत सरकार, करोड़ों रुपये खर्च कर ईरान के चाबहार बंदरगाह को विकसित कर रही है। इसे जोड़ने वाला मार्ग अफगानिस्तान से होकर जाता है। ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता (रिटायर्ड) कहते हैं, तालिबान को भी पैसा चाहिए। वह भारत की शक्ति को अच्छे से पहचानता है। उसे ये भी मालूम है कि चीन और पाकिस्तान से उसे आर्थिक सहायता नहीं मिलेगी। तालिबान को दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ेगा।

चीन की मदद को दुनिया जानती है, इसलिए तालिबान उससे बचकर चलेगा। अभी कतर में हुए समझौते की अहम बातें सार्वजनिक नहीं हुई हैं। उससे आगे की रणनीति का पता चल सकता है। रही बात भारत की सैन्य तैयारी की, वह किसी भी वक्त तालिबान को जवाब दे सकता है। भारतीय सेना हर तरह से सक्षम है। तालिबान की मदद से चीन और पाकिस्तान कुछ गलत न करें, इस पर ही पैनी निगाह रखनी होगी। संभव है कि अल-कायदा, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी समूहों को ज्यादा अनियंत्रित स्थान मिले, लेकिन इन्हें भारत जब चाहे माकूल जवाब दे सकता है।
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