वर्तमान याचिकाकर्ताओं के लिए जीपीआरए, विशेष रूप से इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए जरुरी है कि वे कठोर स्टेशनों पर काम कर रहे हैं, जिन्हें 'गैर-पारिवारिक स्टेशन' के रूप में भी जाना जाता है, उदाहरण के लिए त्रिपुरा, जम्मू और कश्मीर, असम, आदि। इसके अलावा तथ्यों से यह भी प्रतीत होता है कि वे पिछले 4/5/7 वर्षों से अधिक समय से गैर-पारिवारिक स्टेशनों पर काम कर रहे हैं। याचिकाकर्ता नंबर-5 कुपवाड़ा, जम्मू-कश्मीर में 2007 से काम कर रहा है। प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि उनके परिवार, पूर्व आवास में रह रहे हैं। उन्हें कम से कम अगली तारीख तक जारी रखा जाना चाहिए, क्योंकि ये याचिकाकर्ता अपने परिवार के सदस्यों को उन स्थानों पर नहीं ले जा सकते जहां वे सेवा कर रहे हैं।
खास बात ये है कि जवानों की तैनाती की अवधि तीन वर्ष से अधिक है, लेकिन आवास केवल तीन वर्ष के लिए मिलता है। याचिकाकर्ता गैर-पारिवारिक स्टेशनों पर काम कर रहे हैं। प्रथम दृष्टया मामला याचिकाकर्ताओं के पक्ष में है। सुविधा का संतुलन भी याचिकाकर्ताओं के पक्ष में है। यदि विवादित आदेश पर अगली तिथि तक रोक नहीं लगाई जाती है तो याचिकाकर्ता को अपूरणीय क्षति होगी। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को अंतरिम राहत दे दी। यदि आप 3000 जवानों को कठोर स्टेशन पर रख रहे हैं, तो आपको उनके परिवारों को अलग-अलग शहरों में समायोजित करना होगा। उन सभी को दिल्ली में नहीं, अलग-अलग जगहों पर। आपको आम लोगों की कठिनाई को देखना होगा। वकीलों या न्यायाधीशों के रूप में, हमें कतार में खड़ा नहीं होना पड़ता है। लेकिन इन लोगों को अपने परिवार को स्थानांतरित करने के लिए छुट्टी नहीं मिल रही है।
जवानों की दलील है कि हमने खुद से जोखिम वाले इलाकों में पोस्टिंग नहीं मांगी थी। कश्मीर, नॉर्थ ईस्ट या नक्सल में परिवार को कहां पर और कैसे साथ रखें। वहां तो आवास भी नहीं मिलता। हम तो फोर्स वाले हैं, इसलिए यहां पर तीन साल की पोस्टिंग का नियम लागू नहीं होता। दूसरी पोस्टिंग में पांच छह साल लग जाते हैं। दोबारा से 'नॉन फैमिली स्टेशन' मिल जाता है। ऐसे में हम अपने परिवार की सुरक्षा को खतरे में नहीं डालेंगे। सीएपीएफ अधिकारियों और जवानों ने हाई कोर्ट से प्रार्थना की थी कि उनके परिवारों को दिल्ली के सरकारी आवास में ही रहने दिया जाए।