मालूम हो कि दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2013 में एक फैसला दिया था, जिसमें समलैंगिकता को अपराध माना गया था। इसके खिलाफ एलजीबीटी समुदाय ने काफी लंबी लड़ाई लड़ी। जिसके बाद पिछले साल छह सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 के उस प्रावधान को रद्द कर दिया, जिसके तहत आपसी सहमति से बनाए गए समलैंगिक संबंध अपराध की श्रेणी में आते थे।
चीफ जस्टिस रहे दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा था कि हर किसी को निजता का मौलिक अधिकार है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस रोहिंगटन नरीमन, डीवाई चंद्रचूड़, एएम खानविलकर और इंदु मल्होत्रा की संवैधानिक पीठ ने एकमत होकर यह निर्णय दिया था।