बार-बार अनुशासनहीनता पर विद्यार्थी को फटकार लगाना, उसकी हरकत को अभिभावकों की नजर में लाना, एक शिक्षक की जिम्मेदारी है। वह ऐसा अपने विद्यार्थी के उज्ज्वल भविष्य के लिए करता है। अगर इससे तंग आकर कोई छात्र आत्महत्या कर ले तो इसमें शिक्षक को उसे उकसाने के लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के एक शिक्षक के खिलाफ आपराधिक मामले को खारिज करते हुए मंगलवार को यह टिप्पणी की। जस्टिस एस अब्दुल नजीर और कृष्ण मुरारी की पीठ ने कहा, स्कूल का एक अनुशासन होता है। शिक्षक ने जो भी किया वह स्कूल के अनुशासन को बरकरार रखने और बच्चे में सुधार लाने के लिए जरूरी था। अगर कोई बच्चा इतना भावुक हो जो इसके बाद कोई गलत कदम उठाये तो इसके लिए शिक्षक को जिम्मेदार ठहराना गलत है।
14 वर्षीय बालक ने सुसाइड नोट में लिखा था शिक्षक का नाम
बार बार क्लास बंक करने वाले 14 साल के एक बच्चे ने स्कूल में डांट पड़ने और घरवालों को इसके बारे में बताए जाने के बाद खुदकुशी कर ली थी। उसने सुसाइड नोट में लिखा कि टीचर की डांट से आहत होकर वह यह कदम उठा रहा है। सुसाइड नोट के आधार पर मृतक की मां ने शिक्षक के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने की एफआईआर दर्ज कराई थी। शिक्षक ने राजस्थान हाईकोर्ट में इसे खारिज करने की अपील की जिसे अदालत ने ठुकरा दिया। इसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
अनुशासनहीनता के सामने स्कूल वाले आंख नहीं मूंद सकते
पीठ ने कहा, लगातार अनुशासनहीनता पर स्कूल प्रबंधन आंख नहीं मूंद सकता। इस मामले में भी ऐसा कुछ नहीं हुआ जिसे आत्महत्या के लिए उकसाने के साक्ष्य में पेश किया जाए। शिक्षक ने क्लास बंक कर रहे छात्र को ऐसा करने से मना किया। जब कई बार कहने पर भी वह नहीं माना तो इसकी जानकारी प्रधानाचार्य को दी और उन्होंने बच्चे के माता पिता को बुला लिया। इसमें ऐसा कुछ नहीं जिसे आत्महत्या के लिए उकसाने का आधार माना जाए।