वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव।
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जल प्रदूषण से संबंधित छोटे अपराधों में अब जेल की सजा नहीं होगी। राज्यसभा ने इससे संबंधित जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) संशोधन विधेयक, 2024 को ध्वनिमत से मंजूरी दे दी। विधेयक में केंद्र को राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के अध्यक्षों की सेवा शर्तों को निर्धारित करने में सक्षम बनाने और औद्योगिक संयंत्रों की कुछ श्रेणियों को वैधानिक प्रतिबंधों से छूट देने का प्रावधान भी है।
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने विधेयक पर चर्चा के जवाब में संशोधनों से प्रदूषण के खिलाफ संकल्प कमजोर होने की आशंका को खारिज करते हुए कहा कि पुराने कानून में सामान्य नियमों के उल्लंघन पर सजा का प्रावधान था और कुछ उल्लंघन अनजाने में हो जाते थे। इसे देखते हुए नए विधेयक में कैद की जगह जुर्माने का प्रावधान किया गया है। उन्होंने कहा कि इस विधेयक में आपराधिक प्रावधानों को तर्कसंगत बनाने और यह सुनिश्चित करने का प्रस्ताव है कि नागरिक, व्यवसाय और कंपनियां मामूली, तकनीकी या प्रक्रियात्मक चूक के लिए कारावास की सजा के डर के बिना काम करें। विधेयक में फैसला करने वाली इकाई का और उसके फैसले से संतुष्ट न होने की स्थिति में अपीलीय अथॉरिटी के रूप में एनजीटी यानी राष्ट्रीय हरित अधिकरण में याचिका दी जा सकती है। दरअसल, अपराध की प्रकृति के अनुरूप ही दंड का प्रावधान होगा।
रोजाना के हिसाब से लगेगा जुुर्माना
- संशोधन विधेयक में नियमों के उल्लंघन पर प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माने का प्रावधान है। इस राशि से एक विशेष कोष बनेगा, जिसका प्रयोग जल संरक्षण के लिए होगा। इसकी 75 फीसदी रकम राज्यों को दी जाएगी। इसके अलावा कई उल्लंघनों को आपराधिक श्रेणियों से हटाकर उसमें जुर्माने का प्रावधान किया गया है। यह विधेयक 1974 के जल अधिनियम में संशोधन करेगा।
- राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से बिना अनुमति उद्योग स्थापित करने और संचालित करने पर छह साल की कैद और जुर्माने का प्रावधान है। जुर्माना 10 हजार रुपये से लेकर 15 लाख रुपये तक हो सकता है।
- विपक्ष ने कहा है कि उद्योगों को ध्यान रखना चाहिए कि उनके इस्तेमाल में आ रहे पानी से प्रदूषण न फैले। तृणमूल कांग्रेस के जवाहर सरकार ने विधेयक में खनन जैसे विषय को लेकर स्थितियां स्पष्ट न होने के मुद्दे को उठाया।