राजस्थान विधानसभा चुनाव और अपनी भूमिका को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे चर्चा में हैं। भाजपा के विरोधी और वसुंधरा के समर्थक प्रचारित करते हैं कि राजस्थान में वसुंधरा से बड़ा भाजपा का कोई नेता नहीं है। जबकि भाजपा के राष्ट्रीय नेता इससे इत्तेफाक नहीं रखते। मुकाबले में जलशक्ति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत, अर्जुन राम मेघवाल समेत तमाम नाम हैं। हालांकि भीड़, मीडिया में स्पेस, जमीनी पकड़ में मामले में सब वसुंधरा से पीछे नजर आते हैं। वसुंधरा को नजरअंदाज करने का दौर भी चल रहा है तो क्या वसुंधरा राजे के पास चलने को लिए अब कोई नया दांव बचा है?
भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया ने वसुंधरा को पार्टी कायक्रमों में किनारे ही रखा। वसुंधरा ने पार्टी के कार्यक्रमों में हिस्सा भी नहीं लिया, लेकिन वसुंधरा निजी तौर पर न केवल अपनी राजनीति करती रहीं, बल्कि राजस्थान से जुड़े लोगों की बात भी करती रहीं। वसुंधरा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 2014 में शपथ लेने के कुछ समय बाद से राजस्थान के मामले में कभी केन्द्र और राष्ट्रीय नेताओं का कोई दबाव नहीं माना। 2018 के चुनाव में उम्मीदवार उतारने में अपना दबदबा बनाने में सफल रहीं और भाजपा के भीतर आम है कि 45 से अधिक उनके समर्थक विधानसभा में हैं। 25 से अधिक विधायक कट्टर समर्थकों में माने जाते हैं और इनमें से अधिकांश को पार्टी से 2023 के विधानसभा चुनाव में वसुंधरा समर्थक होने के कारण टिकट न मिलने का भय सता रहा है। खबर है कि भाजपा के करीब 40 विधायकों के टिकट कट सकते हैं। कांग्रेस को इससे अपने राजनीतिक फायदे की उम्मीदें हैं।
वसुंधरा के सामने यह स्थिति क्यों आई?
कभी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को केन्द्रीय नेतृत्व की मंशा बताते थे। वसुंधरा राजे इसे अपने हिसाब से स्थान देती थीं। केन्द्रीय नेतृत्व को 2018 में सबसे बड़ी दिक्कत राजस्थान भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष आदि तय करने में आई थी। पूर्व अध्यक्ष परनामी को पद से हटाने की मशक्कत भी सभी को याद है। अब स्थिति इसके उलट है। केन्द्रीय नेतृत्व राज्य की इकाई को अनुशासन का पाठ पढ़ा रहा है कि नेता चाहे जितना बड़ा क्यों न हो, पार्टी से बड़ा नहीं है। वसुंधरा राजे पिछले साल और कुछ महीने से लगातार दिल्ली के दौरे कर रही हैं। प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह से मिलने की कोशिश भी खूब की हैं, लेकिन कोई खास फायदा नहीं हुआ। वहीं पार्टी उन्हें लेकर कई तरह के इशारे भी करती है। वह वसुंधरा के जन्मदिन कार्यक्रम को सफल बना कर यह संदेश देती है कि वसुंधरा का पूरा सम्मान है तो दूसरी तरफ प्रधानमंत्री अपने दौरे के दौरान मंच पर वसुंधरा को उतनी तवज्जो नहीं देते। पार्टी उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाती है और वसुंधरा पार्टी की राजस्थान में चल रही परिवर्तन यात्रा में नजर नहीं आतीं। यानी भीतर ही भीतर हालात शीतयुद्ध जैसे हैं।
तो क्या वसुंधरा राजे चलेंगी कोई दांव?
वसुंधरा राजे ने अभी महिलाओं के सम्मेलन में कहा है कि वह राजस्थान से बाहर नहीं जाएंगी। यह उनका अपने नेताओं के लिए संदेश या फिर शीर्ष नेताओं से मिले संकेत का असर हो सकता है। हालांकि जयपुर से लेकर दिल्ली तक की चर्चा में भाजपा को लेकर सभी सवाल वसुंधरा के इर्द-गिर्द ही घूम रहे हैं। सवाल भी यही है कि वसुंधरा का क्या होगा? वसुंधरा सबकुछ सम्मानजनक तरीके से चाहती हैं और अगर ऐसा न हुआ तो क्या होगा? वसुंधरा राजे ठसक और मिजाज वाली नेता हैं। भाजपा की संस्थापकों में रही राजमाता विजया राजे सिंधिया की बेटी हैं। उनके करीबी सूत्र बताते हैं कि 'म्हारी महारानी दमदार है। चिंता ना करो जी। कुछ न हुआ तो कुछ तो करेगी ही। क्या करेगीं, वहीं जाने।' अभी वसुंधरा सार्वजनिक मंच पर भी किसी के सामने बहुत झुकने का संकेत नहीं देतीं।
चुनाव आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी संकेत देते हैं कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। कुछ औपचारिकता भर बची है। माना जा रहा है कि अगले सप्ताह में कभी भी चुनाव की तारीखों की घोषणा हो सकती है। राजनीतिक दलों के प्रचार अभियान में आई तेजी भी इसी तरफ इशारा कर रही है। बहरहाल यह तो तय ही है कि चुनाव होने में चंद ही दिन बाकी हैं। ऐसे में वसुंधरा राजे को लेकर चल रही चर्चाएं किस मुकाम तक पहुंचती हैं, देखने वाली बात होगी।