केंद्र ने स्टॉक की सप्ताह में दो बार समीक्षा के लिए कोयला मंत्रालय के नेतृत्व में समिति बनाई है। केंद्रीय बिजली प्राधिकरण, कोल इंडिया लि., पावर सिस्टम ऑपरेशन कॉर्पोरेशन, रेलवे और ऊर्जा मंत्रालय की भी कोर प्रबंधन टीम बनाई गई है, जो रोज निगरानी कर रही है।
सरकार की नजर में इसलिए बिगड़े हालात
- अर्थव्यवस्था सुधरी : यह वैसे तो सकारात्मक है, पर इस वजह से देश में बिजली की मांग तेजी से बढ़ी।
- कोयला खदान क्षेत्रों में भारी बारिश : सितंबर में भारी बारिश से उत्पादन व आपूर्ति प्रभावित हुई।
- कीमतें बढ़ीं : कोयला महंगा होने से खरीद सीमित, उत्पादन भी कम।
- मानसून से पहले स्टॉक नहीं : सरकार के अनुसार कंपनियों को यह कदम पहले से उठाना चाहिए था।
- राज्यों पर भारी देनदारी : यूपी, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश पर कंपनियों का भारी बकाया।
कोयला संकट का आकलन दो महीने पहले उस समय ही आ चुका था, जब एक अगस्त को भी महज 13 दिन का ही कोयला भंडारण बचा हुआ था। उस समय थर्मल प्लांट प्रभावित हुए थे और अगस्त के आखिरी हफ्ते में बिजली उत्पादन में 13 हजार मेगावाट की कमी हो गई थी। सीएमटी के हस्तक्षेप ने तब हालात सुधारे थे, लेकिन उत्पादन में अब भी 6960 मेगावाट की कमी चल रही है। दरअसल, कोरोना की दूसरी लहर कम होने के साथ ही औद्योगिक गतिविधियां रफ्तार पकड़ने लगी थीं और इसके साथ ही कोयले की खपत भी बढ़ गई।